अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की प्रसिद्ध अंतरिक्ष यात्री और भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स ने अंतरिक्ष से जुड़ा अपना सक्रिय करियर पूरा कर लिया है। नासा से रिटायरमेंट के बाद सुनीता विलियम्स ने कहा कि अंतरिक्ष में बिताए गए लंबे समय ने उनके जीवन को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने भारत से अपने गहरे जुड़ाव को याद करते हुए कहा कि भारत आना उन्हें हमेशा घर लौटने जैसा महसूस होता है। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष से ज्यादा उन्हें जंगल के भालुओं से डर लगता है।
सुनीता विलियम्स भारतीय मूल की उन गिनी-चुनी अंतरिक्ष यात्रियों में शामिल हैं जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर लंबा समय बिताया। वे अब तक दो बार अंतरिक्ष यात्रा कर चुकी हैं और अंतरिक्ष में कुल 608 दिन बिता चुकी हैं। इसके साथ ही उन्होंने कई स्पेसवॉक कर रिकॉर्ड भी बनाए। रिटायरमेंट के बाद दिए गए एक कार्यक्रम में सुनीता ने कहा कि अंतरिक्ष में जाने के बाद धरती को देखने का नजरिया बदल जाता है। ऊपर से देखने पर धरती पर कोई सीमा, देश या विभाजन नजर नहीं आता। उन्होंने कहा, जब आप अंतरिक्ष से धरती को देखते हैं तो यह एहसास होता है कि हम सभी एक ही ग्रह के निवासी हैं। वहां से इंसानों के आपसी झगड़े और बहसें बेकार लगने लगती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि अंतरिक्ष यात्रा केवल पहले पहुंचने की दौड़ नहीं है बल्कि सबसे अहम बात यह है कि अंतरिक्ष यात्री वहां सुरक्षित रहें और सुरक्षित वापस लौटें। सुनीता के मुताबिक, अंतरिक्ष मिशनों में धैर्य, अनुशासन और टीमवर्क सबसे बड़ी ताकत होते हैं। भारत को लेकर अपनी भावनाएं साझा करते हुए सुनीता विलियम्स ने कहा कि उनके पिता भारतीय मूल के हैं और भारत से उनका भावनात्मक रिश्ता हमेशा बना रहा है। उन्होंने कहा, जब भी मैं भारत आती हूं मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं अपने घर वापस आई हूं। यहां की संस्कृति, लोग और अपनापन मुझे बहुत सुकून देता है। सुनीता ने यह भी बताया कि भारत में अंतरिक्ष विज्ञान को लेकर बढ़ती जागरूकता और युवाओं का उत्साह उन्हें प्रेरित करता है। उन्होंने कहा कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अंतरिक्ष के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है और आने वाले समय में भारतीय युवा वैश्विक मंच पर बड़ी भूमिका निभाएंगे।

सुनीता विलियम्स ने अंतरिक्ष यात्रियों की ट्रेनिंग को लेकर भी बात की और कहा कि यह बेहद कठोर और अनुशासित होती है। लंबे समय तक परिवार से दूर रहना, शारीरिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करना आसान नहीं होता लेकिन मिशन की सफलता के लिए यह जरूरी है। रिटायरमेंट के बाद भी सुनीता विलियम्स विज्ञान, शिक्षा और अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़ी गतिविधियों में सक्रिय रहेंगी। उन्होंने कहा कि वे अपने अनुभवों के जरिए युवाओं को प्रेरित करना चाहती हैं ताकि आने वाली पीढ़ी अंतरिक्ष और विज्ञान के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर सके।
भालुओं से लगता है डर, अंतरिक्ष से नहीं

कार्यक्रम के दौरान जब सुनीता विलियम्स से पूछा गया कि क्या अंतरिक्ष जैसे खतरनाक मिशनों के दौरान उन्हें कभी डर लगा तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि डर तो आज भी लगता है लेकिन वह डर अंतरिक्ष से नहीं बल्कि भालुओं से लगता है। जंगल में जब आप होते हैं और सामने भालू आ जाए तो वह सच में डराने वाला अनुभव हो सकता है। सुनीता ने कहा कि अंतरिक्ष में जाने से पहले हर स्थिति के लिए वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से तैयारी की जाती है। वहां जोखिम जरूर होता है लेकिन डर को काबू में रखने की ट्रेनिंग दी जाती है। इसके उलट धरती पर कुछ हालात ऐसे होते हैं जहां अनिश्चितता ज्यादा होती है।
उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष मिशन में हर कदम योजनाबद्ध होता है। आप जानते हैं कि क्या करना है, कैसे करना है। लेकिन जंगल में अचानक भालू से सामना हो जाए तो वहां कोई मैनुअल काम नहीं करता। सुनीता ने यह भी जोड़ा कि डर होना गलत नहीं है। डर इंसान को सतर्क बनाता है। उन्होंने कहा कि डर का मतलब यह नहीं कि आप कमजोर हैं। डर होना यह दिखाता है कि आप इंसान हैं। जरूरी यह है कि डर के बावजूद आप सही फैसला लें और आगे बढ़ें। उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष यात्रियों को मानसिक रूप से इस तरह तैयार किया जाता है कि वे तनाव और भय की स्थिति में भी संतुलन बनाए रखें। यही गुण उन्हें कठिन मिशनों में सफल बनाता है।








