धामी कैबिनेट फैसला : Uttarakhand सरकार ने हजारों उपनल कर्मचारियों को बड़ी राहत देते हुए उनके लिए समान कार्य-समान वेतन लागू करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। बृहस्पतिवार को हुई कैबिनेट बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। इसके तहत 10 वर्ष की निरंतर सेवा पूरी कर चुके उपनल कर्मियों को अब उनके पद के समकक्ष नियमित कर्मचारियों के न्यूनतम वेतन के बराबर मानदेय मिलेगा। इस फैसले से प्रदेशभर में करीब 21 हजार कर्मचारी लाभान्वित होंगे।

कैबिनेट बैठक में कुल 19 प्रस्तावों पर मुहर लगी। जिनमें उपनल कर्मियों के मानदेय के अलावा समान नागरिक संहिता (यूसीसी) में संशोधन और होम-स्टे नीति में बदलाव प्रमुख रहे। उपनल कर्मियों के लिए यह निर्णय चरणबद्ध रूप से लागू किया जाएगा। पहले चरण में वर्ष 2015 तक 10 साल की सेवा पूरी कर चुके लगभग 8 हजार कर्मचारियों को तत्काल लाभ मिलेगा। इसके बाद 2016 और 2018 तक सेवा अवधि पूरी करने वाले कर्मियों को शामिल किया जाएगा। कैबिनेट सचिव शैलेश बगौली ने बताया कि यह फैसला नैनीताल हाईकोर्ट के कुंदन सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य मामले में दिए गए निर्देशों और मंत्रिमंडलीय उप-समिति की सिफारिशों के आधार पर लिया गया है। फैसले के बाद उपनल कर्मियों के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से भेंट कर आभार जताया।

यूसीसी में संशोधन, पंजीकरण के लिए एक साल की मोहलत
कैबिनेट ने समान नागरिक संहिता उत्तराखंड (संशोधन) अध्यादेश-2025 को भी मंजूरी दी। जनवरी 2025 से पहले हुई शादियों के पंजीकरण के लिए अब छह महीने के बजाय एक वर्ष का समय मिलेगा। इसके साथ ही पंजीकरण प्रक्रिया को सरल बनाते हुए अपर सचिव स्तर के अधिकारी को पेनल्टी लगाने का अधिकार दिया गया है।
16 विशेष न्यायालय, 144 नए पद
गंभीर अपराधों के त्वरित निस्तारण के लिए प्रदेश में 16 विशेष न्यायालय स्थापित किए जाएंगे। पहले चरण में चार जिलों में एडीजे और एसीजेएम स्तर के न्यायालय खुलेंगे। इनके संचालन के लिए 144 नए पद सृजित किए गए हैं।

होम-स्टे योजना में स्थानीयता पर जोर
राज्य की होम-स्टे नीति में बड़ा बदलाव करते हुए तय किया गया कि अब इस योजना का लाभ केवल उत्तराखंड के मूल और स्थायी निवासियों को ही मिलेगा। बाहरी राज्यों के लोग राज्य सरकार की होम-स्टे सब्सिडी और सुविधाओं के पात्र नहीं होंगे। इसका मुख्य उद्देश्य पहाड़ की संपत्तियों और वहां के पारंपरिक घरों को व्यावसायिक घरानों के कब्जे से बचाना है। पिछले कुछ वर्षों में देखा गया था कि बाहरी राज्यों के निवेशक पहाड़ के गांवों में पुराने घर खरीदकर या लीज पर लेकर बड़े पैमाने पर होम-स्टे चला रहे थे, जिससे स्थानीय लोगों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा था। नई नीति के बाद अब राज्य सरकार की सब्सिडी, टैक्स में छूट और बिजली-पानी की घरेलू दरों का लाभ केवल स्थानीय लोग ही उठा पाएंगे। सरकार चाहती है कि होम-स्टे के माध्यम से होने वाली आय सीधे पहाड़ के गांवों में रहने वाले परिवारों की जेब में जाए। नई नियमावली में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि होम-स्टे में आने वाले पर्यटकों को उत्तराखंड की मूल संस्कृति, खान-पान और परंपराओं का अनुभव मिले। पंजीकरण के मानकों को अब और अधिक सरल बनाया जाएगा ताकि दूरस्थ गांवों के लोग भी आसानी से ऑनलाइन पंजीकरण कर सकें। सरकार का लक्ष्य है कि 2026 तक राज्य में होम-स्टे की संख्या को दोगुना किया जाए, ताकि होटलों के बजाय पर्यटक गांवों की ओर रुख करें।








