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    Home»एडीटर स्पेशल»Uttarakhand : ये गुलाब कहां का है ?
    एडीटर स्पेशल

    Uttarakhand : ये गुलाब कहां का है ?

    महकते गुलाब की बगिया किसे अच्छी नहीं लगती। कभी सुरज की पहली किरण को किसी गुलाब के फूल पर पड़ते देखिए...यकीन मानिये वो पल कुछ अलग ही होता है। गुलाब की एक खास प्रजाति है डैमस्क रोज। ये फूल देखने में जितना खूबसूरत लगता है, इसका व्यावसायिक उपयोग भी उतनी ही ज्यादा है।
    Arjun Singh RawatBy Arjun Singh RawatFebruary 5, 2025Updated:March 5, 2025No Comments
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    गुलाब की सुगंधित किस्मों में खास जगह रखने वाले डैमस्क गुलाब की परफ्यूमरी उद्योग में बहुत डिमांड है। इसका तेल बहुत महंगा है। प्राकृतिक तौर पर आर्गेनिक स्टेट Uttarakhand में होने वाले डैमस्क गुलाब से निकलने वाले रोज ऑयल और रोज वाटर का तो क्या ही कहने। उत्तराखंड की ठंडी जलवायु डैमस्क गुलाब के लिए बहुत उपयुक्त है। यही वजह है कि संगध पौधा केंद्र यानी कैप की मदद से पर्वतीय जिलों में बहुत से किसान इसकी खेती कर रहे हैं।

    यह भी पढ़ें : पहाड़ों पर नाच रहे मोर, फरवरी में अमरूद के पेड़ फलों से लदे
    मिसालें खोजने के लिए आपको कहीं जाना नहीं पड़ता, मिसालें आपके आसपास ही होती हैं। क्या गुलाब की खेती से भी इतना कमाया जा सकता है कि परिवार की गुजर बसर हो सके, इसका जवाब है ‘हां’। ये कहानी मैं आपके लिए लाया हूं जोशीमठ के मेरंग, सुनील और परसारी गांव से…। इन गांवों में जब मैं गया तो मैंने देखा कि लोगों ने गुलाब को आय का जरिया बना लिया है। जोशीमठ के मेरंग में गुलाब की खेती करने वाले उमराव सिंह बताते हैं, मैं छोटे कास्तकारों से भी फूल खरीदता हूं। इससे हमारे पास 2000 लीटर तक गुलाब जल निकलता है। अभी हमारे पास 12 बायर्स है, जो बाहर भी गुलाब जल को बेचते हैं। एक तो भिवंडी में है, वह सिंगापुर बेचता है। अल्मोड़ा में एक शख्स है, जो जर्मनी की कंपनी को बेचता है।

    कुछ समय पहले हम अपने गुलाब जल को कन्नौज ले गए थे। वहां के बायर्स ने कहा, यह गुलाब जल कहां तैयार करते हो, हमने कहा- जोशीमठ में…। उन्होंने तुरंत कहा, इसका तेल लाओ, हम उसका 17 से 20 लाख रुपये तक दे देंगे। हम जो गुलाब जल निकालते हैं, उसमें कोई छेड़खानी नहीं करते, कोई केमिकल नहीं है और जो भी गुलाब है, पूरा ऑर्गेनिक है, ऑर्गेनिक खाद से तैयार है। उमराव सिंह कहते हैं, अभी इससे मेरा रोजगार भी ठीक चल रहा है। साल 2000 में मेरे पास कुछ नहीं था। अभी मेरे पास अपना मकान है। इससे ही मैंने सबकुछ किया। दो बच्चों को पढ़ाया, लिखाया। अभी मेरे दोनों बेटे सरकारी नौकरी पर हैं। उमराव सिंह बताते हैं कि सगंध पौधा केंद्र सेलाकुईं की टीम ने उन्हें गुलाब की खेती के लिए रीचआउट किया। उन्होंने ही गुलाब जल निकालने की यूनिट भी दिलवाई।

    परसारी गांव में ही स्वयं सहायता समूह बनाकर गुलाब जल तैयार कर रहीं रीता रावत बताती हैं कि मेरे समूह का नाम जय नरसिंह देवता है। मैं 2016 से गुलाब की खेती कर रही हूं और मैं गुलाब जल बनाती हूं और मार्केट में बेचती हूं। हमारे समूह में 10 लेडीज हैं। हम एक साथ गुलाब की खेती करते हैं। गुलाब जल निकालते हैं और इसे मार्केट में बेचते हैं। हमारा गुलाब जल जोशीमठ मार्केट में जाता है। इसके अलावा औली और बद्रीनाथ में भी हम इसे भेजते हैं। जहां से डिमांड आती है, वहां हम गुलाब जल भेज देते हैं।


    भारत तिब्बत सीमा पुलिस यानी आईटीबीपी से रिटायर्ड आत्माराम घिल्डियाल सुनील गांव में रहते हैं। वह यहां अपनी पत्नी के साथ मिलकर गुलाब की खेती करते हैं। साल 2012 से गुलाब की खेती कर रहे आत्माराम बताते हैं, मैंने देखा कि यहां जोशीमठ के आर्मी एरिया में गुलाब अच्छे होते हैं। तभी से मेरा गुलाब की खेती करने का सपना था। गुलाब की खेती में मेरा साथ मेरी धर्म पत्नी भी देती हैं। वह भी सेवानिवृत्त हैं। हम दोनों मिलकर गुलाब की खेती करते हैं और हमारा अच्छा उत्पादन हो जाता है। गुलाब की खेती बहुत बढ़िया काम है। इसमें एक बार गुलाब के पौधे लगा दिए तो वो कभी खत्म नहीं होते। उसमें हमेशा फूल आते रहते हैं। यह बहुत फायदे का धंधा है। इस क्षेत्र में यह किसानों के लिए वरदान है। उत्तराखंड की जलवायु में गुलाब की खेती बहुत बढ़िया होती है।

    ‘कैप’ ने दिखाई स्वरोजगार की राह
    इन सभी किसानों में एक बात कॉमन है, कैप की मदद। सगंध पौधा केंद्र ने पर्वतीय इलाकों में बड़ी संख्या में किसानों को गुलाब की खेती से जोड़ा है। किसानों को आजीविका के साधन उपलब्ध कराने की कैप की कोशिशों को तब पंख लगे, जब जोशीमठ जैसे दुर्गम इलाके में लोगों ने डैमस्क गुलाब की खेती को अपनाया। छोटे कोशिश से शुरू हुआ ये सिलसिला आज किसानों को बड़ा फायदा पहुंचा रहा है।
    कैप ने किसानों को डैमस्क गुलाब की खेती के साथ-साथ रोज ऑयल और रोज वाटर निकालने का भी प्रशिक्षण दिया। उन्हें तेल और गुलाब जल निकालने के लिए 20 किलोग्राम क्षमता वाले मिनी आसवन संयंत्र फ्री मुहैया कराए। आज किसान गुलाब जल और रोज ऑयल की खुद पैकेजिंग कर उसे बेच रहे हैं। जोशीमठ तो डैमस्क गुलाब की खेती के लिए मिसाल बन गया है। यहां जितने मन-जतन से किसान गुलाब की खेती कर रहे हैं, महिला सेल्फ हेल्प ग्रुप भी उतने ही दिल से इस काम में जुटे हैं। देश में उत्पादन के मुकाबले गुलाब के तेल की बाजार में बहुत खपत है, जिसे दूसरे देशों से आयात किया जाता है। इसकी व्यापक खेती से देश गुलाब के तेल उत्पादन में आत्मनिर्भर बन सकता है।

    खर्चा कम, मुनाफा ज्यादा
    डैमस्क गुलाब की खेती हर लिहाज से फायदे का सौदा है। इसकी कलम के पौध तैयार कर अतिरिक्त आमदनी की जा सकती है। एक बार लगा दो तो 10-12 साल तक इसमें फूल आते हैं। खेत की मेड़ और बागीचों में लगाकर भी गुलाब की खेती की जा सकती है। इसे जानवर भी नुकसान नहीं पहुंचाते। डैमस्क गुलाब पारंपरिक फसलों की तुलना में तीन गुना फायदा देता है। यानी खर्चा कम, मुनाफा ज्यादा।
    कैप के रोज क्लस्टर
    कैप ने वर्तमान में पिथौरागढ़ जिले में नारायण आश्रम, जयकोट, पश्ती, सोसा, हिमखोला, पश्मा, अल्मोड़ा जिले में ताकुला, बीना, पनेरगांव, लोहना और थापला, टिहरी में अंजनीसैंण, धारपयांकोटी और धारकोट, रुद्रप्रयाग में ऊखीमठ और गिरिया, देहरादून में चकराता, चमोली में परसारी, औली, मेरंग, द्विंग-तपोण, जोशीमठ, थराली और उत्तरकाशी के सरांश में डैमस्क गुलाब के क्लस्टर विकसित किए हैं।

    अतुल्य उत्तराखंड गुलाब की खेती स्पेशल स्टोरी
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    Arjun Singh Rawat
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    पत्रकारिता का लंबा करियर। एजेंसी,टीवी, अखबार, मैग्जीन, रेडियो और डिजिटल मीडिया का अनुभव। राष्ट्रीय मीडिया में 15 साल काम करने के बाद पहाड़ों का रुख। पहाड़ के मुद्दों पर खुलकर बोलने का दम। जमीन पर काम करने का जज़्बा और जुनून आज भी वैसा ही, जैसा पहले दिन था।

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