उत्तराखंड, भारत के उत्तर-पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में स्थित एक ऐसा पर्वतीय राज्य है, जो विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियों से संपन्न है, जो कृषि एवं हार्टीकल्चर की अपार संभावनाएं रखता है। पर्वतीय क्षेत्रों में उद्यानिकी यहां के निवासियों की आजीविका का मुख्य साधन है। उत्तराखंड के पर्वतीय किसान सेब और कीवी जैसे महंगे फलों की खेती में लाखों रुपये खर्च करते हैं, दिन-रात मेहनत करते हैं, फिर भी उत्पादन अक्सर अस्थिर रहता है; इसके विपरीत नींबू, कागजी नींबू, संतरा, माल्टा और मंदारिन जैसी सिट्रस फसलें कम लागत, सीमित श्रम और स्थिर आमदनी का भरोसेमंद स्रोत हैं। हिमालय की जंगली प्रजातियां और प्राकृतिक संकरण इस बहुमूल्य विविधता को और भी अनमोल बनाते हैं, फिर भी इसका पूर्ण उपयोग अभी तक नहीं हुआ है। अब समय आ गया है कि हम आयातित फसलों पर निर्भरता कम करें, किसानों की मेहनत और मिट्टी की असाधारण क्षमता को सशक्त करें, और उत्तराखंड की सिट्रस खेती को स्थिरता, समृद्धि और नई ऊंचाइयों की ओर ले जाएं। हाल ही में राजकीय उद्यान सर्किट हाउस गढ़ीकैंट में उत्तराखंड माल्टा महोत्सव का आयोजन किया गया। इसकी टैगलाइन थी ‘घाम तापो, नींबू सानो’। उत्तराखंड की सिट्रस प्रजातियों के लिए यह पहल निश्चित तौर पर अच्छी कही जा सकती है, लेकिन अभी माल्टा और सिट्रस प्रजातियों पर काफी काम करने की जरूरत है।

उत्तराखंड के पौड़ी, टिहरी, अल्मोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर और रुद्रप्रयाग जिलों में सिट्रस प्रजातियां पारंपरिक रूप से उगाई जाती रही हैं, जिसमें प्रमुख रूप से माल्टा, लेमन एवं लाइम समूह, किन्नू, नागपुरी संतरा और स्थानीय सिट्रस शामिल हैं। यह क्षेत्र 600–1500 मीटर की ऊंचाई, मध्यम तापमान (12–28° सेल्सि.), संतुलित वार्षिक वर्षा (1000–1600 मिमी) और अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टियों के कारण सिट्रस विकास के लिए अत्यंत उपयुक्त है। सरकारी एवं वैज्ञानिक आंकड़े संकेत करते हैं कि पिछले 10–15 वर्षों में इन जिलों में सिट्रस क्षेत्र और उत्पादन में स्थिर वृद्धि हुई है, जिससे यह फल राज्य की बागवानी विविधीकरण और किसानों की स्थायी आय रणनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
सिट्रस की कम लागत, कम श्रम और स्थायी उत्पादन क्षमता इसे पहाड़ी कृषि में लाभकारी बनाती है, जबकि आधुनिक तकनीक जैसे क्लोनल पौधारोपण, पोषणीय सुधार, सिंचाई प्रबंधन और रोग नियंत्रण द्वारा उत्पादन और गुणवत्ता में और सुधार संभव है। इस प्रकार, सिट्रस न केवल पारंपरिक फल है, बल्कि उत्तराखंड की सतत और लाभकारी बागवानी नीति में केंद्रीय भूमिका निभाने वाली फसल के रूप में उभर रही है। उत्तराखंड में सिट्रस की विविध प्रजातियां हिमालयी परिस्थितियों के अनुरूप उगाई जाती हैं, जो न केवल स्थानीय किसानों के लिए स्थिर आय का स्रोत हैं बल्कि राज्य की पारंपरिक कृषि एवं खाद्य संस्कृति का भी अभिन्न हिस्सा हैं। प्रमुख सिट्रस प्रजातियों में माल्टा अपने उच्च रस सामग्री और संतुलित शर्करा-पामरता अनुपात के कारण सबसे अधिक उगाई जाती है और इसे पर्वतीय क्षेत्रों में ‘संतरे का राजा’ कहा जाता है। संतरा/किन्नू समूह सीमित रूप से पाया जाता है, लेकिन इसकी संभावनाएं अत्यंत उज्ज्वल हैं। लेमन एवं लाइम समूह घरेलू उपयोग के साथ-साथ कॉमर्शियली भी महत्वपूर्ण हैं, जबकि स्थानीय सिट्रस प्रकार पारंपरिक कृषि प्रणाली में गहराई से शामिल हैं और इनकी हिमालयी परिस्थितियों में उच्च अनुकूलता है।
उत्तराखंड की जलवायु और भौगोलिक विशेषताओं ने इन सिट्रस प्रजातियों को राज्य की कृषि पहचान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका दी है। सिट्रस फसलों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि ये 600 से 1500 मीटर की ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में अत्यंत अनुकूल रूप से विकसित होती हैं, जहां सामान्यतः मध्यम तापमान एवं उपयुक्त नमी की स्थिति पाई जाती है। ये फसलें तापमान के उतार-चढ़ाव तथा कम अवधि के हल्के जल आभाव को सहन करने की क्षमता रखती हैं, जिसके कारण बदलती जलवायु स्थितियों में भी इनका उत्पादन स्थिर बना रहता है। सिट्रस पौधे अच्छी जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी में उत्कृष्ट वृद्धि एवं उच्च गुणवत्ता वाले फल उत्पादन के लिए जाने जाते हैं। साथ ही, अन्य कई फल प्रजातियों की तुलना में इन पर रोग-कीटों का दबाव अपेक्षाकृत कम पाया गया है, जिससे इनकी देख-भाल और प्रबंधन अपेक्षाकृत सरल एवं कम लागत वाला रहता है। इन समग्र विशेषताओं के कारण सिट्रस फसलें उत्तराखंड के छोटे एवं मध्यम किसानों के लिए आर्थिक रूप से अधिक लाभकारी, जोखिम रहित तथा दीर्घकालिक आजीविका सुरक्षा प्रदान करने वाली उपयुक्त फसल प्रणाली के रूप में उभरती हैं।

उत्पादन तकनीक एवं प्रबंधन
सफल सिट्रस उत्पादन के लिए प्रबंधन के उचित तौर तरीके बहुत अहम हैं। सबसे पहले, स्थानीय जलवायु, ऊंचाई तथा मृदा की स्थिति के अनुसार उपयुक्त किस्मों का चयन उत्पादकता और फल गुणवत्ता सुनिश्चित करने का आधार होता है। पौध स्थापना के समय सामान्यतः 4–6 मीटर (अलग-अलग सिट्रस प्रजातियों के अनुसार) की दूरी बनाए रखना उपयुक्त पाया गया है, जिससे पौधों के बीच पर्याप्त प्रकाश, वायु संचार तथा पोषक तत्वों की प्रतिस्पर्धा कम होती है और पौधों का संतुलित विकास संभव हो पाता है। मृदा की उर्वरता एवं संरचना को बनाए रखने के लिए जैविक खाद, गोवर खाद, कंपोस्ट एवं मृदा सुधारक तत्वों का नियमित प्रयोग आवश्यक है, जो न केवल पौधों के पोषण को बेहतर बनाते हैं बल्कि मृदा के भौतिक एवं जैविक स्वास्थ्य को भी सुदृढ़ करते हैं। सिंचाई की दृष्टि से सिट्रस बागानों को सीमित सिंचाई की आवश्यकता होती है; साथ ही वर्षा-जल संरक्षण उपाय जैसे कंटूर बंडिंग या चेक पिट निर्माण जल उपलब्धता को स्थिर बनाए रखते हैं। सिट्रस पौधों में अत्यधिक छंटाई की आवश्यकता नहीं होती, केवल न्यूनतम प्रूनिंग से ही पौधों का आकार, प्रकाश अवशोषण और उत्पादक शाखाओं का संतुलन बनाए रखा जा सकता है। इन सभी प्रथाओं से स्पष्ट होता है कि सिट्रस बागान प्रबंधन अपेक्षाकृत सरल, कम श्रम-प्रधान तथा आर्थिक रूप से व्यवहार्य होता है।

आर्थिक एवं सामाजिक महत्व
सिट्रस फलों के मूल्य संवर्धन एवं विपणन की दृष्टि से प्रत्यक्ष विक्रय, जूस एवं स्क्वैश निर्माण सहित विभिन्न प्रसंस्कृत उत्पादों जैसे मार्मलेड, कैंडी तथा पेक्टिन उत्पादन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने की व्यापक संभावनाएँ प्रस्तुत करते हैं। प्रत्यक्ष विक्रय से किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त होता है, जबकि जूस एवं स्क्वैश निर्माण जैसी घरेलू एवं लघु उद्योग-आधारित इकाइयां आय के अतिरिक्त स्रोत उपलब्ध कराती हैं। इसी प्रकार मार्मलेड, कन्फेक्शनरी उत्पाद तथा पेक्टिन जैसी औद्योगिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण सामग्रियां न केवल कृषि उत्पाद के अपव्यय को कम करती हैं, बल्कि उच्च मूल्य श्रृंखला से किसानों को जोड़ने में सहायक होती हैं। इन गतिविधियों से ग्रामीण क्षेत्रों में उद्यमिता को प्रोत्साहन मिलता है, विशेष रूप से छोटे किसानों, महिलाओं और युवाओं के लिए रोजगार एवं स्व-रोजगार के स्थिर अवसर विकसित होते हैं। फलस्वरूप, यह आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक सशक्तिकरण तथा आजीविका के विविधीकरण में योगदान देते हुए राज्य में पलायन नियंत्रण एवं ग्रामीण विकास को सकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं।


25 साल में माल्टे की पैदावार बढ़ाने के लिए क्या किया?
पिछले लगभग 25 वर्षों (2000–2025) में माल्टे की पैदावार बढ़ाने के लिए किए गए उपाय कागज़ों और योजनाओं तक सीमित रहे, जिनका ज़मीनी प्रभाव अपेक्षित नहीं रहा। इस अवधि में राज्य गठन के बाद राष्ट्रीय बागवानी मिशन (एनएचएम), एमआईडीएच, राज्य औद्यानिकी योजनाओं के तहत पौध वितरण, बाग विस्तार, सूक्ष्म सिंचाई, प्रशिक्षण और फल महोत्सव जैसे कदम उठाए गए, जिससे माल्टा का रकबा कुछ जिलों (अल्मोड़ा, पौड़ी, टिहरी, नैनीताल) में बढ़कर अनुमानतः 10–12 हजार हेक्टेयर तक पहुंचा, लेकिन उत्पादकता 6–8 टन/हेक्टेयर से आगे नहीं बढ़ सकी, जबकि वैज्ञानिक रूप से यह 15–18 टन/हेक्टेयर तक संभव है। बेहतर पौध सामग्री, प्रमाणित नर्सरी, रूट स्टॉक सुधार, रोग-कीट प्रबंधन, पोषण प्रबंधन और फील्ड जीन बैंक जैसी दीर्घकालीन वैज्ञानिक व्यवस्था के अभाव में पुराने बाग बूढ़े होते गए और नई पौध की गुणवत्ता असमान रही। 2024-25 में ₹10/किग्रा एमएसपी की घोषणा एक सकारात्मक कदम जरूर है, लेकिन प्रोसेसिंग, कोल्ड-चेन और संगठित बाज़ार न होने से किसान को वास्तविक लाभ नहीं मिल पाया। पिछले 25 वर्षों में योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद माल्टा न तो राज्य की प्रमुख नकदी फसल बन सका, न ही उसकी पैदावार में कोई क्रांतिकारी वृद्धि हुई—जो साफ दर्शाता है कि नीति-घोषणाओं से आगे बढ़कर वैज्ञानिक सुधार, जर्मप्लाज्म संरक्षण और मूल्य संवर्धन आधारित रणनीति अपनाए बिना माल्टा का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता।


10 रुपये एमएसपी…ऐसे कैसे उत्पादन बढ़ेगा
उत्तराखंड राज्य सरकार द्वारा माल्टे का न्यूनतम समर्थन मूल्य मात्र 10 रुपये प्रति किलो घोषित करना उत्पादन बढ़ाने के बजाय किसानों को हतोत्साहित करता है, क्योंकि पर्वतीय क्षेत्रों में माल्टे की वास्तविक उत्पादन लागत 15–20 रुपये प्रति किलो (तुड़ाई, ढुलाई, स्थानीय परिवहन और मजदूरी सहित) बैठती है; ऐसे में किसान को सीधे 5–10 रुपये प्रति किलो का घाटा होता है, जबकि पंजाब–हरियाणा या महाराष्ट्र से आने वाले संतरा/किन्नू का थोक मूल्य 25–40 रुपये प्रति किलो रहता है। राज्य में वर्तमान में माल्टे का क्षेत्रफल लगभग 8–9 हजार हेक्टेयर और औसत उत्पादकता 6–7 टन/हेक्टेयर है, जो वैज्ञानिक प्रबंधन से आसानी से 12–15 टन/हेक्टेयर तक जा सकती है, लेकिन जब एमएसपी लागत से भी कम हो तो किसान न तो बागों का प्रबंधन करता है, न नए पौधारोपण में निवेश करता है और न ही रोग-कीट नियंत्रण अपनाता है, ऐसे में बाग उपेक्षित होते जा रहे हैं। साफ है कि 10 रुपये एमएसपी के साथ उत्पादन बढ़ने की उम्मीद अव्यावहारिक है; इसके लिए कम से कम 20–25 रुपये प्रति किलो एमएसपी, स्थानीय प्रोसेसिंग यूनिट, मूल्य संवर्धन और संगठित विपणन तंत्र अनिवार्य है, अन्यथा माल्टा भी पहाड़ से धीरे-धीरे गायब होने की कगार पर पहुँच जाएगा।
प्रोसेसिंग का हाल… कितने सेंटर, कहां क्या सुविधा?
उत्तराखंड में माल्टे की प्रोसेसिंग व्यवस्था बेहद कमजोर है—राज्य में अभी तक माल्टे-विशेष के लिए कोई समर्पित, बड़े पैमाने का प्रोसेसिंग सेंटर विकसित नहीं हो पाया है; कुछ जिलों (नैनीताल, अल्मोड़ा, पौड़ी, टिहरी) में सूक्ष्म फूड प्रोसेसिंग इकाइयां हैं, जहां सीमित स्तर पर जूस, स्क्वैश, जैम और कैंडी बनाई जाती है, लेकिन इनकी क्षमता कुछ क्विंटल से 1–2 टन/दिन से अधिक नहीं है। राज्य में मेगा फूड पार्क या आधुनिक सिट्रस प्रोसेसिंग लाइन (पल्प एक्सट्रैक्शन, कंसंट्रेट, वैक्सिंग-ग्रेडिंग, कोल्ड स्टोरेज) का अभाव है, जिसके कारण कुल उत्पादन का 85–90% माल्टा कच्चे फल के रूप में औने-पौने दामों पर बिक जाता है या नष्ट हो जाता है। प्रोसेसिंग की यह कमी सीधे किसानों की आय, बाजार स्थिरता और माल्टे के भविष्य—तीनों पर भारी पड़ रही है।


प्रोसेसिंग फील्ड में स्किल्ड लोगों की कमी!
उत्तराखंड में माल्टे के प्रोसेसिंग फील्ड में स्किल्ड मानव संसाधन की गंभीर कमी राज्य की मौजूदा मूल्य श्रृंखला के लिए सबसे बड़ा बाधक बन चुकी है। वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, राज्य के फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में सिर्फ 8–10% ही उच्च तकनीकी कौशल वाले श्रमिक उपलब्ध हैं, जबकि 70% कार्यबल केवल बेसिक या सेमी-स्किल्ड स्तर का है। विशेष रूप से पॉस्ट-हार्वेस्ट टेक्नोलॉजी, ग्रेडिंग, वैक्सिंग, पल्प एक्सट्रैक्शन और गुणवत्ता नियंत्रण जैसी उन्नत प्रक्रियाओं में दक्षता लगभग शून्य के करीब है। इसका वैज्ञानिक असर यह है कि फलों में एंटीऑक्सिडेंट, विटामिन सी और फाइटोन्यूट्रिएंट्स का न्यूनतम क्षरण रोकने वाली प्रक्रियाएं सही ढंग से लागू नहीं हो पा रही हैं, जिससे माल्टे की रस की गुणवत्ता, शेल्फ लाइफ और बाजार मूल्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियों और प्रशिक्षण केंद्रों की कमी के कारण आधुनिक उपकरण संचालक, फूड टेक्नोलॉजिस्ट और प्रोसेसिंग इंजीनियर उपलब्ध नहीं हैं, जिससे राज्य का माल्टे वैल्यू-एडिशन पूरा क्षमता से संचालित नहीं हो पा रहा है और किसानों की आय स्थिर नहीं हो रही।

कहां रही नारंगी की दाणि…माल्टा भी उसी ओर जा रहा!
पहाड़ की पारंपरिक नारंगी के लुप्त होने की प्रक्रिया जिस वैज्ञानिक ढांचे में हुई, वही संकेत आज माल्टा में भी स्पष्ट दिखने लगे हैं, क्योंकि अधिकांश बाग 25–40 वर्ष पुराने हो चुके हैं जिनमें डिक्लाइन सिंड्रोम विकसित हो गया है जिसमें फाइटोफ्थोरा जनित जड़-सड़न, ट्रिस्टेज़ा वायरस, पोषण असंतुलन (विशेषकर Zn, B, Mg की कमी), मृदा कार्बनिक कार्बन में गिरावट और जल-धारण क्षमता का क्षय शामिल है; बीज से उगाए गए असमान पौधों के कारण आनुवंशिक शुद्धता व उत्पादकता घटती गई, वहीं जलवायु परिवर्तन के चलते सर्दियों में अपर्याप्त चिलिंग, असामान्य वर्षा और तापमान वृद्धि से फ्लावरिंग-फ्रूट सेट फीजियोलॉजी बाधित हुई, फल-झड़ यानी जून ड्राप बढ़ा और टीएसएस-एसिड रेसियो बिगड़ा; इसके साथ ही वैज्ञानिक छंटाई, संतुलित पोषण, सूक्ष्म तत्व प्रबंधन, उपयुक्त रूट स्टॉक (जैसे रफ लेमन के विकल्प) और कायाकल्प वाली छंटाई को अपनाए बिना बागों को छोड़ दिया गया, परिणामस्वरूप माल्टा भी उसी जैविक–आर्थिक ढलान पर है जिस पर कभी पहाड़ी नारंगी फिसल गई थी—और यदि त्वरित रूप से रोग-मुक्त नर्सरी प्रणाली, क्लोन चयन, समेकित पोषण और जल प्रबंधन, तथा प्रसंस्करण-आधारित मूल्य श्रृंखला विकसित नहीं की गई, तो माल्टा का भविष्य भी वैज्ञानिक रूप से अस्थिर और सामाजिक रूप से अदृश्य होता जाएगा।








