भारत निर्वाचन आयोग के मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान (SIR) के पूरा होने के बाद 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए उत्तराखंड की मतदाता सूची तैयार हो गई है। नई मतदाता सूची के बाद उत्तराखंड की मतदाता संख्या में 2022 विधानसभा चुनावों के मुकाबले, करीब 10 लाख की कमी आई है। उत्तराखंड सामान्य तौर पर कम मतदान प्रतिशत वाले राज्यों में गिना जाता है, अब जब मतदाता संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है तो सबकी नजर, 2027 के मत प्रतिशत पर होगी, कि क्या इस बार उत्तराखंड में मतदान का रिकॉर्ड टूटेगा? ये सवाल इसलिए भी उठ खड़ा हुआ है क्योंकि एसआईआर प्रक्रिया के बाद संपन्न, बिहार, बंगाल के चुनाव में मतदान प्रतिशत में शानदार उछाल देखने को मिला है, इस कारण अब सबकी नजर उत्तराखंड के मतदाताओं पर होगी। उत्तराखंड में मतदान का रुझान और एसआईआर प्रक्रिया का इस पर संभावित असर को लेकर चुनावी आंकड़ों के विश्लेषक वरिष्ठ पत्रकार संजीव कंडवाल की रिपोर्ट –
SIR अभियान के बाद उत्तराखंड की मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन तीन अक्तूबर को कर दिया गया है। अंतिम प्रकाशन के बाद उत्तराखंड की कुल मतदाता सख्या 71 लाख 58 हजार 949 रह गई है, जो एसआईआर से पहले 79 लाख 60 हजार 762 थी। हालांकि इससे पहले 2022 के विधानसभा चुनाव के समय उत्तराखंड की कुल मतदाता संख्या 81 लाख 72 हजार 173 थी, यानि पिछले विधानसभा चुनाव से अब तक उत्तराखंड की मतदाता संख्या में 10 लाख 13 हजार 224 मतदाताओं की कमी आ चुकी है।


उत्तराखंड की मतदाता संख्या में पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले दस प्रतिशत से अधिक की कमी, उत्तराखंड के मतदान प्रतिशत को भी प्रभावित कर सकती है। उत्तराखंड में अब तक का सर्वाधिक विधानसभा मतदान, 2017 के विधानसभा चुनावों में 66.25 प्रतिशत हुआ है। जानकारों के मुताबिक कुल मतदाता संख्या में गिरावट आने से कुल मत प्रतिशत में उछाल आ सकता है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि अब तक मतदाता सूची में बड़ी संख्या में ऐसे मतदाताओं के नाम रहते थे, जो वास्तविक तौर पर अपनी जगह पर नहीं हैं, इस कारण इनके मतदान प्रक्रिया में भाग नहीं ले पाने से राज्य का मतदान प्रतिशत कम रह जाता था। इस बार मतदाता सूची अधिक वास्तविक होने से इसमें उछाल आने की संभावना है। ऐसा हुआ तो उत्तराखंड आगामी विधानसभा चुनावों में नया रिकॉर्ड बना सकता है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो राज्य की पहली विधानसभा के लिए हुए चुनाव में कुल 54.34 प्रतिशत मतदान हुआ था, जो अगले चार चुनावों में लगातार बढ़ते हुए 2017 में रिकॉर्ड 66.25 प्रतिशत तक पहुंच गया। इसके बाद 2022 में कुल मतदान प्रतिशत में करीब दो प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। पिछली बार राज्य में कुल 64.07 प्रतिशत मतदान हुआ था, फिर भी ये पहले चुनाव से करीब 10 प्रतिशत अधिक था। बढ़ते मतदान रुझान के बीच मतदान में महिला मतदाताओं की हिस्सेदारी भी लगातार बढ़ रही है। बीते पांच विधानसभा चुनावों में पहले चुनाव के बाद हर चुनाव में महिला मतदाताओं ने पुरुष मतदाताओं से अधिक मतदान किया है। 2022 आते-आते महिला-पुरुष के बीच मतदान का अंतर पांच प्रतिशत से अधिक हो गया है। यानि उत्तराखंड में बढ़े हुए मतदान प्रतिशत के पीछे महिला मतदाताओं की अधिक भागीदारी एक महत्वपूर्ण वजह रही है। हालांकि एक विडंबना यह है कि एसआईआर के बाद अब प्रदेश की एक भी विधानसभा ऐसी नहीं रह गई है, जहां महिला मतदाता संख्या में पुरुषों से आगे हों। यानि सभी 70 विधानसभा सीटों पर अब पुरुष मतदाता संख्या बल में महिलाओं से आगे निकल गए हैं।

क्या बिहार-बंगाल को दोहराएगा उत्तराखंड?
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के बाद हुए विधानसभा चुनावों में बिहार और पश्चिम बंगाल में मतदान प्रतिशत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज हुई।
बिहार में 2020 के विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत करीब 57.33 प्रतिशत रहा था। इसके मुकाबले एसआईआर के बाद नवंबर 2025 में हुए विधानसभा चुनाव में मतदान बढ़कर 67.13 प्रतिशत पहुंच गया। यानी करीब 9.80 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई। निर्वाचन आयोग के मुताबिक यह 1951 के बाद बिहार में अब तक का सर्वाधिक मतदान प्रतिशत था। बिहार में एसआईआर के दौरान 24 जून 2025 को करीब 7.90 करोड़ मतदाता थे। अंतिम सूची में करीब 7.45 करोड़ मतदाता रह गए। यानि एसआईआर के बाद बिहार में मतदाता सूची का आकार घटा और उसी चुनाव में मतदान प्रतिशत में करीब 9.8 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी दर्ज हुई। हालांकि इस बढ़ोतरी को केवल मतदाता संख्या में कमी का परिणाम नहीं माना जा सकता।
इसी तरह पश्चिम बंगाल में भी इसी तरह की तस्वीर नजर आती है। यहां 2021 के विधानसभा चुनाव में मतदान 82.30 प्रतिशत था, जबकि 2026 के चुनाव में कुल मतदान 92.47 प्रतिशत तक जा पहुंचा। यानी करीब 10.17 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी। ये पश्चिम बंगाल का अब तक का सबसे अधिक मतदान प्रतिशत है। बंगाल में भी एसआईआर के दौरान मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित और डुप्लीकेट मतदाताओं की पहचान और नामों की जांच की प्रक्रिया हुई। इससे मतदाता सूची के आकार में बदलाव आया, जिसका मतदान प्रतिशत के गणित पर भी असर पड़ सकता है। इस तरह बिहार और बंगाल, दोनों राज्यों में एसआईआर के बाद हुए विधानसभा चुनावों में पिछले चुनाव के मुकाबले मतदान प्रतिशत में करीब 10 प्रतिशत अंक की छलांग दिखाई दी है।











