42 वर्षों से किशन मलड़ा ने अपना जीवन पूरी तरह हरियाली को समर्पित कर रखा है। 1984 से अब तक यह सिलसिला 10 लाख पेड़ों तक पहुंचता है, जिनमें से कई आज हरे-भरे लहलहा रहे हैं। उनकी नर्सरी में 60 हजार से अधिक पौधे तैयार हो रहे हैं, जिनमें जामुन, नींबू, अखरोट, आंवला, हरड़, तेजपत्ता, आम, च्यूरा, मूंगा रेशम और अमलतास जैसे औषधीय एवं फलदार पौधे शामिल हैं। यह नर्सरी केवल पौध उत्पादन का केंद्र नहीं, बल्कि भविष्य की हरियाली का जीवंत बीज है जिसे देखने देश-विदेश से लोग आते हैं। कई लोगों को रोजगार भी मिला। प्रकृति के प्रति इस अद्वितीय योगदान के लिए किशन मलड़ा को ‘वृक्ष पुरुष’ की उपाधि से सम्मानित किया गया है।
बहुत कम लोग किशन मलड़ा जैसे होते हैं, जो ईमानदारी से यह भी स्वीकार करते हैं कि हर पौधा जीवित नहीं रहता। वह संख्या नहीं, सच्चाई की बात करते हैं। उनके लिए असली काम पेड़ लगाना नहीं बल्कि उसे बचाना है। किशन मलड़ा ने पंतक्वैराली क्षेत्र में जटायु स्रोत के आसपास कई वर्षों तक पौधारोपण किया। परिणाम यह हुआ कि क्षेत्र में जल स्रोतों में सुधार हुआ और अब वहां लगभग 13 पेयजल योजनाएं शुरू हो चुकी हैं। इन योजनाओं के माध्यम से घिरौली, जोशीगांव, भागीरथी, मंडलसेरा समेत बागेश्वर के बड़े हिस्से को पेयजल उपलब्ध हो रहा है।
अपने लगाए पेड़ों में से किसी एक की कहानी बतानी हो तो किस पेड़ को चुनेंगे?
अगर किसी एक की कहानी बतानी हो तो मैं सबसे पहले उस पीपल के पेड़ की बात करूंगा जिसे मैंने वर्ष 1984 में मंडलसेरा में लगाया था। उस समय वह जगह बिल्कुल अलग थी। चारों तरफ खाली खेत थे। कोई खास बसावट नहीं थी। रास्ते कच्चे थे और लोगों का आना-जाना भी बहुत कम था। उस माहौल में मैंने बस एक छोटा सा पीपल का पौधा लगाया। लेकिन समय के साथ उस पौधे ने जो रूप लिया वह अपने आप में एक कहानी बन गया। आज वही स्थान पीपल चौक के नाम से जाना जाता है। वहां अब पक्की सड़क बन चुकी है, आसपास कॉलोनियां बस चुकी हैं। वह जगह लोगों के लिए एक ठहराव का केंद्र बन गई है। लोग वहां आते हैं, बैठते हैं, विश्राम करते हैं। वहां पूजा-पाठ होता है। जब मैं आज उस स्थान से गुजरता हूं तो मेरे अंदर एक अलग ही भावना उठती है। मैं यह महसूस करता हूं कि एक छोटा सा पौधा जिसे मैंने बिना किसी अपेक्षा के लगाया था, वह आज एक पहचान बन गया है।
इतने सारे पेड़ लगाए कितने जीवित हैं?
जब लाखों पेड़ों की बात होती है वह असल में मेरे द्वारा इतने वर्षों में लगाए और वितरित किए गए पौधों की कुल संख्या है। यह काम मैंने अकेले नहीं किया बल्कि वन विभाग, वन निगम, वन पंचायतों और ग्राम पंचायतों के सहयोग से लगातार चलता रहा। जहां-जहां जरूरत पड़ी, वहां मैंने पौधे दिए, लोगों को प्रेरित किया और कई जगह खुद भी लगाकर आया। लेकिन एक सच्चाई मैं साफ कहना चाहता हूँ 10 लाख पौधे लगाए गए हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि 10 लाख पेड़ आज जीवित हैं। ऐसा कहना सही नहीं होगा। पेड़ लगाना एक प्रक्रिया है लेकिन उन्हें बचाना सबसे बड़ी चुनौती है। मैं मानता हूं कि अगर तीस फीसदी यानी तीन लाख पेड़ भी जीवित होंगे तो यह मेरे लिए बड़ी उपलब्धि है।
जब पौधारोपण कोई ट्रेंड नहीं था, लोगों का रवैया कैसा था?
आजकल तो हर कोई पौधरोपण की बात करता है। उस दौर में लोगों में जागरूकता की कमी थी। तब आज की तरह न बड़े अभियान होते थे न सोशल मीडिया था। फोटो खींचकर दिखाने का चलन न था। आज लोग पौधा लगाकर उसे साझा करते हैं। सरकारें करोड़ों रुपये खर्च करती हैं। उस समय ऐसा कुछ भी नहीं था। जब आप कोई नया काम शुरू करते हैं तो लोगों की प्रतिक्रिया भी अलग-अलग होती है। कुछ समर्थन करते हैं, बहुत से लोग सवाल करते हैं। मेरे साथ भी यही हुआ। लोग पूछते थे यह क्यों कर रहा है? इससे क्या फायदा होगा? कई बार लोग मजाक भी उड़ाते थे। उन्हें यह समझ में नहीं आता था कि कोई व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के पेड़ क्यों लगा रहा है।
आपने लोगों को कैसे जोड़ा?
मैंने बस इतना कहा कि अगर आप 4–5 पौधे भी अपने घर के आसपास लगा लें तो आने वाले समय में आपको इसका लाभ जरूर मिलेगा। उस समय लोगों की सोच अलग थी। वे आम, अनार, अखरोट जैसे पेड़ों की बात करते थे लेकिन मैंने उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि हर जगह एक ही प्रकार के पेड़ नहीं लगाए जा सकते। जो भी पेड़ लगाएं वह अपने क्षेत्र की जलवायु और जरूरत के अनुसार होना चाहिए। मैंने लोगों को यह भी बताया कि सिर्फ फल देने वाले पेड़ ही जरूरी नहीं हैं, बल्कि ऐसे पेड़ भी जरूरी हैं जो उनके रोजमर्रा के जीवन में काम आएं। इसलिए मैंने चारा पत्ती वाले पेड़ों पर भी जोर दिया। जैसे भीमल, काफल और अन्य स्थानीय प्रजातियां। ये पेड़ पशुओं के लिए चारा देते हैं और परिवार की जरूरतों को पूरा करते हैं। शुरुआत में बहुत कम लोग जुड़े। कुछ लोगों ने सुना, कुछ ने नजरअंदाज किया। धीरे-धीरे जब लोगों ने परिणाम देखे तो उनका भरोसा बढ़ा। फिर वही लोग दूसरे लोगों को जोड़ने लगे। इस तरह यह काम धीरे-धीरे फैलता गया। आज स्थिति यह है कि हमारे क्षेत्र भली गांव से लेकर फेनिया, बिलोना, खेरा, जोसी, गुगना इन इलाकों में अगर आप जाएंगे तो लगभग हर परिवार के पास 10–12 पेड़ आपको मिल जाएंगे।

जीवन में ऐसा समय आया जब आपको लगा कि यह सब छोड़ देना चाहिए?
एक समय ऐसा था जब सब कुछ ठीक चल रहा था अचानक मेरे कूल्हे में पुरानी चोट का असर सामने आने लगा। यह चोट मुझे पहले लगी थी लेकिन उस समय उसका पूरा प्रभाव समझ में नहीं आया था। धीरे-धीरे दर्द बढ़ता गया और स्थिति ऐसी हो गई कि 1998–99 के आसपास मैं बहुत ज्यादा परेशान रहने लगा। दर्द इतना बढ़ गया था कि सामान्य चलना-फिरना भी कठिन हो गया। आखिरकार मुझे ऑपरेशन कराना पड़ा। मेरा ऑपरेशन पीजीआई चंडीगढ़ में हुआ। वह समय मेरे जीवन का बहुत कठिन दौर था। उस दौरान मन में सबकुछ छोड़ देने का ख्याल मन में कई बार आया था। लेकिन, वह कर नहीं सका। आप विश्वास करेंगे कि ऑपरेशन के सिर्फ 21 दिन बाद ही मैं वॉकर के सहारे अपने जंगल तक पहुंच गया। उस दिन मुझे लगा कि जिन पेड़ों को मैंने अपने हाथों से लगाया है जिनकी देखभाल की है वे मुझे पहचानते हैं। उस क्षण ने मुझे यह अहसास कराया कि मेरा और इन पेड़ों का रिश्ता सिर्फ श्रम का नहीं बल्कि भावनाओं का है।
आपने कहा कि पेड़ आपसे बात करते हैं, क्या यह अनुभव सच में होता है?
यह बातचीत शब्दों में नहीं होती, लेकिन उसे महसूस किया जा सकता है। यह कोई आवाज नहीं होती, कोई भाषा नहीं होती, लेकिन जो सुकून और जुड़ाव भीतर महसूस होता है, वही उस संवाद का रूप है। जब आप किसी पौधे को अपने हाथों से लगाते हैं। उसे रोज देखते हैं, उसकी देखभाल करते हैं। उसे पानी देते हैं। उसकी रक्षा करते हैं तो धीरे-धीरे उसके साथ एक भावनात्मक रिश्ता बन जाता है। वह सिर्फ एक पेड़ नहीं रहता, बल्कि आपके जीवन का हिस्सा बन जाता है। जब वह पौधा धीरे-धीरे बढ़ता है, पत्ते निकलते हैं, शाखाएं फैलती हैं और आप उसे हर दिन थोड़ा-थोड़ा विकसित होते देखते हैं, तो भीतर एक अलग ही संतोष पैदा होता है। यह संतोष ही उस बातचीत का एहसास देता है।
जब पहली बार चिड़िया आपके लगाए पेड़ों पर आई, तो कैसा लगा?
यह घटना वर्ष 2014–15 के आसपास की है। बचपन में मैंने उस चिड़िया की आवाज सुनी थी। लेकिन उस समय मुझे यह नहीं पता था कि यह कौन-सी चिड़िया है। बस एक ध्वनि थी, जो मन में कहीं बस गई थी। कई साल बाद, जब मैंने अपने लगाए हुए पेड़ों के बीच उसी आवाज को दोबारा सुना तो मैं ठिठक गया। ध्यान से सुना, फिर समझ आया कि यह वही चिड़िया है जिसकी आवाज बचपन में सुनी थी। उस पल को शब्दों में बताना आसान नहीं है। उस समय मैंने सबसे पहले अपनी माताजी को यह बात बताई। मेरे लिए वह एक बहुत भावनात्मक और खास क्षण था। क्योंकि यह सिर्फ एक चिड़िया का आना नहीं था, यह उस पूरे प्रयास का उत्तर था जो मैंने वर्षों तक पेड़ लगाकर किया था। मैंने इस अनुभव को अपनी वाटिका की रजत जयंती, यानी 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर भी साझा किया था। उस दिन कई लोग आए थे।
पेड़ लगाना ज्यादा कठिन है या उन्हें बचाना?
अब मैं अपने इतने वर्षों के अनुभव के आधार पर यह साफ समझ चुका हूं कि पेड़ लगाना कठिन काम नहीं है। प्रकृति में अपने आप पुनर्जीवित होने की अद्भुत क्षमता होती है। अगर उसे सही परिस्थितियां मिल जाएं तो वह बिना हमारे हस्तक्षेप के भी बहुत कुछ खुद कर सकती है। लेकिन असली समस्या यह है कि हमने अपने आसपास के हालात ऐसे बना दिए हैं कि अब प्रकृति को अपने हाल पर छोड़ना संभव नहीं रह गया है। जंगल कटे हैं, जल स्रोत सूखे हैं। जमीन की उर्वरता कम हुई है और वातावरण का संतुलन बिगड़ा है। इन परिस्थितियों में सिर्फ यह सोच लेना कि पौधा लगा देंगे और वह अपने आप बड़ा हो जाएगा यह व्यवहारिक नहीं है। मैंने बार-बार यह देखा है कि लोग पौधा तो लगा देते हैं लेकिन उसके बाद उसे भूल जाते हैं। ऐसे में वह पौधा ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह पाता। इसलिए मैं हमेशा कहता हूं कि असली काम पौधा लगाने में नहीं, बल्कि उसे बचाने में है। पौधा लगाना शुरुआत है, लेकिन उसे पेड़ बनने तक पहुंचाना ही असली जिम्मेदारी है।

आपके जीवन का निष्कर्ष क्या है?
मेरे जीवन ने मुझे यह समझाया है कि सफलता किसी बड़ी उपलब्धि का नाम नहीं बल्कि सही दिशा में लगातार चलते रहने का नाम है। मैंने सीखा है कि प्रकृति से प्रेम करना ही जीवन से प्रेम करना है। जब हम पेड़ों, हवा, पानी और धरती का सम्मान करते हैं, तो असल में हम अपने आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सम्मान करते हैं। सपने वही सच्चे हैं जो अकेले नहीं साथ मिलकर पूरे किए जाएं। मेरी माता देवकी देवी 85 वर्ष की हैं। उन्होंने हमेशा मेरा उत्साह बढ़ाया। मेरे पिताजी स्वर्गीय हिम्मत सिंह जी से मैंने जीवन के संस्कार और मेहनत का महत्व सीखा। मेरी पढ़ाई की शुरुआत अपने गांव से ही हुई। मैंने प्राइमरी शिक्षा मंडलसेरा के प्राथमिक विद्यालय से प्राप्त की। उसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए मैं बागेश्वर गया। पंजाब के पठानकोट से हाई स्कूल तक की शिक्षा ली। इसके बाद मैंने फिर बागेश्वर लौटकर अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की और वहीं से पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया। 1989 में जब हमारे क्षेत्र में डाकघर खुला, तो मैं उससे जुड़ गया। शुरुआत में बहुत कम आमदनी होती थी करीब 375 रुपये से काम शुरू हुआ। मैं ब्रांच पोस्ट ऑफिस में एक्स्ट्रा एजेंट के रूप में काम करता रहा और आज भी उसी से जुड़ा हुआ हूं। जो भी थोड़ी-बहुत आमदनी होती है, उसी से मैंने अपनी नर्सरी और पर्यावरण के काम को आगे बढ़ाया। इसके साथ परिवार का भी पूरा सहयोग मिला।
दिखावे का साधन बन गया है पौधरोपण
लोग पौधारोपण को जिम्मेदारी नहीं बल्कि दिखावे का साधन बना लेते हैं। आज के समय में यह एक ट्रेंड बन गया है। एक दिन तय होता है बड़े स्तर पर कार्यक्रम होता है, लाखों पौधे लगा दिए जाते हैं। फोटो खिंचती हैं, खबरें बनती हैं और फिर कुछ दिनों बाद सब खत्म हो जाता है। कोई यह देखने वापस नहीं जाता कि जिन पौधों को लगाया गया था उनका क्या हुआ। मैंने अपने अनुभव में बार-बार यही देखा है कि प्रक्रिया पूरी तो कर दी जाती है लेकिन उसका परिणाम शून्य रहता है। जंगलों में तो एक और समस्या सामने आती है दीमक और कीट की। अगर आपने सही तरीके से तैयारी नहीं की तो पौधा लगते ही कुछ दिनों में खत्म हो जाता है। 80 के दशक की बात कर रहा हूं। उस समय मैं वन विभाग की नर्सरी में जाता था। वहां देहरादून के पेड़ उगाए जा रहे थे। सिल्वर ओक जैसी बाहरी प्रजातियां लगाई जा रही थीं। लेकिन हमारे अपने स्थानीय पेड़ों को उतना महत्व नहीं दिया जा रहा था। यह बात मुझे अंदर से खटकती थी। मैं सोचता था कि हमारे अपने पेड़ों में कितनी खासियत है। जैसे कचनार, इसके फूल और छाल में औषधीय गुण हैं। जो पशुओं के लिए भी उपयोगी हैं। लेकिन हम उन्हें छोड़कर बाहर की प्रजातियों पर ध्यान दे रहे थे। तभी से मैंने तय कर लिया था कि मैं अपने क्षेत्र की, अपनी मिट्टी की, अपने पर्यावरण के अनुसार पेड़ लगाने पर ही जोर दूंगा।
खराब गोबर से भी मरते हैं पौधे
कई जगहों पर मैंने देखा है कि एक सप्ताह के भीतर ही पौधे सूख जाते हैं या दीमक उन्हें अंदर से खा जाती है। खासकर जहां पिरूल या सूखी घास ज्यादा होती है और गड्ढे के आसपास नमी कम होती है, वहां यह समस्या और बढ़ जाती है। अगर गड्ढे में डाला गया गोबर भी ठीक से तैयार नहीं है तो वह खुद कीटों को आकर्षित करता है। ऐसे में पौधा टिक ही नहीं पाता। इसका सबसे दुखद पहलू यह है कि जो मेहनत की गई, जो संसाधन लगाए गए, जो उम्मीद थी सब व्यर्थ हो जाता है। और इससे भी बड़ी बात यह है कि लोगों का भरोसा भी धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। वे सोचते हैं कि पेड़ लगाना बेकार है, जबकि असल समस्या पेड़ लगाने में नहीं, बल्कि उसे न बचाने में है। मेरे लिए यह हमेशा चिंता का विषय रहा है कि हम संख्या के पीछे भाग रहे हैं गुणवत्ता और परिणाम को नजरअंदाज कर रहे हैं। अगर हम 100 पौधे लगाकर 80 बचा लें तो वह ज्यादा मूल्यवान है, इसकी बजाय कि हम 1000 लगाकर 900 खो दें।
छोटे समूहों को दी जाए जिम्मेदारी
5 से 10 लोगों का एक छोटा समूह बनाया जाए। कक्षा छह से 12वीं तक विद्यार्थियों को भी इसमें शामिल किया जाए। यह समूह किसी एक क्षेत्र को अपनाए, चाहे वह 5 एकड़ हो, 10 एकड़ हो या उससे अधिक। फिर उस क्षेत्र को 5 साल या 10 साल के लिए उसी समूह को सौंप दिया जाए। जब किसी व्यक्ति या समूह को किसी जमीन की जिम्मेदारी मिलती है तो उसका नजरिया बदल जाता है। वह सिर्फ पौधा लगाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उस पौधे को पेड़ बनने तक देखता है। पेड़ों का चयन जगह के हिसाब से किया जाए। जैसे अगर किसी क्षेत्र में काफल की बेल्ट है तो वहां काफल लगाया जाए। जहां जामुन अच्छी तरह उग सकता है, वहां जामुन के वन विकसित किए जाएं। जहां अखरोट की संभावना है, वहां अखरोट के पेड़ लगाए जाएं। इस मॉडल का एक और बड़ा फायदा यह है कि इसमें निरंतर देखभाल सुनिश्चित होती है। वही समूह उस क्षेत्र की निगरानी करेगा, आग से बचाव करेगा। समय-समय पर पानी देगा और पौधों की सुरक्षा करेगा। इसके साथ ही मैं यह भी मानता हूं कि सरकार और पंचायतों को भी इस दिशा में सोचना चाहिए। हर साल नए पौधे लगाने पर खर्च करने के बजाय अगर वे इस तरह के समूहों को जिम्मेदारी दें तो परिणाम कहीं बेहतर हो सकते हैं।
मूंगा रेशम में असीम संभावना
शुरुआत में यह मेरे लिए एक प्रयोग था लेकिन धीरे-धीरे यह एक सफल मॉडल बनता जा रहा है। वर्ष 2020 से हमने मूंगा रेशम की फसल लेना शुरू किया। पिछले दो वर्षों से हम लगातार साल में तीन-तीन फसलें ले रहे हैं। इस सत्र में हम पहली फसल ले रहे हैं और मुझे पूरी उम्मीद है कि इस साल हम पांच से छह फसलें लेने में सफल होंगे। मैंने मूंगा रेशम की खेती एक बीघा जमीन में शुरू की थी। लगभग 150–200 पौधे लगाए गए थे। अगर एक बीघा में मूंगा रेशम के पौधे लगाए हैं तो करीब लाख रुपये तक बचा सकते हैं। मूंगा रेशम खेती एक बहुत ही संभावनाशील क्षेत्र है। इसमें कम समय में फसल तैयार हो जाती है और यदि सही तरीके से किया जाए तो यह किसानों के लिए अच्छा रोजगार और आय का साधन बन सकता है। मैं शिलिंग पौधे को अपने काम में एक बहुत उपयोगी प्रजाति मानता हूं। यह पौधा तेजी से बढ़ता है और पशुओं के लिए अच्छा हरा चारा देता है। जिससे ग्रामीण परिवारों को सीधा लाभ मिलता है। मैंने देखा है कि जहां शिलिंग लगाया जाता है, वहां मिट्टी का कटाव कम होता है और जमीन की नमी बनी रहती है। यह पौधा कम देखभाल में भी अच्छी तरह बढ़ जाता है, इसलिए किसानों के लिए आसान विकल्प है। मेरे अनुभव में शिलिंग पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आजीविका सुधार का भी एक मजबूत साधन बन सकता है।










