- अतुल्य उत्तराखंड ब्यूरो
अक्सर कहा जाता है कि पीड़ा ही साहित्य की जननी होती है। ‘छाया-माया आपकी’ के लेखक महेंद्र सी. कपिल के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। इस पुस्तक की नींव किसी पुस्तकालय में नहीं बल्कि जीवन के उन कड़वे अनुभवों के बीच पड़ी जहां अपनों ने ही साथ छोड़ दिया था। बात 1980 के दशक के अंतिम वर्षों की है। हल्द्वानी में कीमती पैतृक संपत्ति जिस पर अधिकार होना चाहिए था, उसे अपनों (ताऊ जी) ने ही छल से हड़प लिया। यह 1988 का दौर था जब लेखक की नई-नई नौकरी लगी थी। बच्चे छोटे थे और माताजी वृद्ध हो चुकी थीं। संपत्ति हड़पने की साजिशों और मानसिक प्रताड़ना के उस दौर ने लेखक को भीतर तक झकझोर दिया।
महेंद्र सी. कपिल विज्ञान के छात्र थे। बायो से बीएसएसी और अंग्रेजी में एमए के नाते उन्होंने कभी अदृश्य शक्तियों या काले जादू जैसी बातों पर विश्वास नहीं किया था लेकिन उन कठिन वर्षों में हुई रहस्यमयी अनुभूतियों ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया। आज की तार्किक दुनिया में शायद यह बात लोगों को हंसा दे लेकिन वह बताते हैं कि उस भारी संकट के समय अल्मोड़ा के पुजारी सुदेशचंद्र पंत ने उन्हें न्याय के देवता गोल्ज्यू देवता (राजा बाला गोरिया) के मंत्रों का जाप करने को कहा। यहीं से उनके जीवन में एक नया मोड़ आया। मंत्रों से उपजी आध्यात्मिक ऊर्जा ने न केवल लेखक को मानसिक संबल दिया बल्कि उनके भीतर के रचनाकार को भी जगा दिया। इसके बाद स्थितियां काबू में आती गईं। इसके बाद वह 1993 में लखनऊ स्थित राज्य संसाधन केंद्र में एक महीने की ट्रेनिंग के लिए गए। विज्ञान और अंग्रेजी भाषा की पृष्ठभूमि ने उनके लेखन को एक सटीक दृष्टि दी। वह बताते हैं कि तब से ही उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था।
2004 में पहली बार उन्हें लगा कि गोल्ज्यू देवता की कृपा गाथा को शब्दों में पिरोयें। हालांकि, काफी सोच विचार के बाद उन्हें लगा कि उनके संघर्ष और गोल्ज्यू देवता की कृपा की जो गाथा है उसे केवल कविताओं में नहीं समेटा जा सकता। वर्ष 2010 में मिली एक अंतःप्रेरणा (आदेश) ने उन्हें बाध्य किया कि वह राजा बाला गोरिया के उस स्वरूप को दुनिया के सामने लाएं जिसने उन्हें टूटने से बचाया था। यह पुस्तक उसी 15-16 साल की तपस्या का फल है।
‘छाया-माया आपकी’ पुस्तक में लेखक ने 26 कहानियों के माध्यम से न केवल उनके जन्म और चमत्कारों को रेखांकित किया है बल्कि उन्हें एक सामाजिक सुधारक और अनाथों के रक्षक के रूप में भी प्रस्तुत किया है। सब कहानियां रोचकता समेटे हुए हैं। कहानी ‘सबका सहारा’ और ‘उन्हें गोलोक ने भेजा है’ भगवान कृष्ण के अवतार के रूप में बाला गोरिया के जन्म की कथा कहती है। जन्म के समय विमाताओं द्वारा उन्हें नदी में बहाया जाना, सिल-बट्टे से तुलना और अंततः काठ के घोड़े को पानी पिलाकर अपना देवत्व सिद्ध करना ये प्रसंग उनके बाल्यकाल के संघर्ष और चमत्कारिक शक्ति को दर्शाते हैं।
लेखक ने ‘अनाथों के नाथ’ और ‘हक दिलाया’ जैसी कहानियों के माध्यम से दिखाया है कि गोल्ज्यू देवता केवल मंदिरों तक सीमित नहीं हैं बल्कि वे समाज के वंचितों, गरीबों और शोषितों के रक्षक हैं। चाहे वह अनाथ कमला का संघर्ष हो या भीमताल की भागा महर की हड़पी हुई जमीन, गोल्ज्यू देवता का न्याय सदैव सत्य के पक्ष में खड़ा मिलता है। कहानी न्याय जरूर होगा यह स्पष्ट करती है कि जहां आधुनिक कानून या प्रशासन असफल हो जाता है वहां गोरिया का दरबार न्याय की अंतिम आशा बनता है। पुस्तक की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें गोल्ज्यू देवता को केवल दुष्टों का संहारक नहीं, बल्कि उनका हृदय परिवर्तन करने वाले देव के रूप में दिखाया गया है। नकुवा मसाण, धूनी मसाण और जटिया मसाण जैसे खूंखार तत्वों को उन्होंने न केवल परास्त किया बल्कि उन्हें नेह-नेकी की राह पर चलाकर देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया।
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‘वास्तविकता के पल’ और ‘गुरु का आदेश’ जैसी कहानियां राजा बाला गोरिया और गुरु गोरखनाथ के अटूट संबंध को दर्शाती हैं। यह पुस्तक प्रतिपादित करती है कि हिमालयी संस्कृति और सनातन धर्म की रक्षा में नाथ संप्रदाय और गोरिया का भारी योगदान रहा है। जियो और जीने दो का संदेश देते हुए वे पशु बलि के विरुद्ध दूधाधारी (अहिंसक) स्वरूप में प्रकट होते हैं। जैसा कि ‘मैं खून नहीं पीता’ कहानी में दर्शाया गया है। कहानियां चंपावत (काली कुमाऊं), अल्मोड़ा, नैनीताल और नेपाल के क्षेत्रों में फैली हुई हैं। ‘कंडोलिया देव’ और ‘परियों को बचाया’ जैसी कथाएं उत्तराखंड की लोक मान्यताओं और भूम्याल देवताओं के अंतर्संबंधों को स्पष्ट करती हैं।
क्यों पढ़ें
छाया-माया आपकी मात्र कहानियों का संग्रह नहीं है बल्कि यह लोक-संस्कृति के माध्यम से ईश्वरत्व की खोज है। यह पुस्तक बताती है कि राजा बाला गोरिया आज भी अपनी सूक्ष्म उपस्थिति (छाया) से भक्तों का कल्याण कर रहे हैं। लेखक ने सफलतापूर्वक यह सिद्ध किया है कि लोक-आस्था की जड़ें तर्क और श्रद्धा दोनों में गहराई तक जमी हुई हैं। यह कृति उन पाठकों के लिए अनमोल है जो उत्तराखंड की आध्यात्मिक विरासत और लोक-देवताओं के मानवीय पक्षों को समझना चाहते हैं। किताब के दो संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। तीसरा संस्करण जल्द ही बाजार में आने वाला है। इसमें चार कहानियां और जोड़ी गई हैं।विशेषताएं
भाषा-शैली: पुस्तक की भाषा अत्यंत सहज और सरल है जो सीधे पाठकों के हृदय से जुड़ती है।
प्रतीकात्मकता: कहानियों में घोड़े, दिव्य प्रकाश और स्वप्न यात्राओं का प्रयोग लेखक ने रहस्यों को सुलझाने के लिए बखूबी किया है।
उद्देश्य: पुस्तक का मूल संदेश जिओ और जीने दो, जीव दया और न्याय पर आधारित है।
लेखक के बारे में
2 नवंबर 1964 को नैनीताल जिले के मुक्तेश्वर (ग्राम दियारी) में जन्मे महेंद्र सी. कपिल ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्राम दियारी के प्राथमिक पाठशाला से शुरू की। विज्ञान में स्नातक और फिर रुहेलखंड विश्वविद्यालय बरेली से अंग्रेजी साहित्य में एमए करने के बाद, उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अपना जीवन समर्पित किया। राजकीय इंटर कॉलेज ढोकोने (नैनीताल) में लंबे समय तक अंग्रेजी प्रवक्ता के पद पर अपनी सेवाएं देने के बाद वर्ष 2022 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली ताकि वे अपना पूरा समय साहित्य और लोक-सेवा को समर्पित कर सकें।











