हार्ट अटैक (दिल का दौरा) और ब्रेन अटैक (मस्तिष्क का दौरा या स्ट्रोक) के बारे में तो आपने कई बार सुना होगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि इंसानी कान में भी दौरा पड़ता है? जी हां, चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इसे कान का अटैक या इयर स्ट्रोक कहा जाता है। इस स्थिति में मरीज की सुनने की क्षमता (हियरिंग पावर) अचानक से पूरी तरह खत्म यानी शून्य हो जाती है। हाल ही में देश की सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका अलका याग्निक भी इसी गंभीर बीमारी की चपेट में आ गई थीं जिसके बाद से यह बीमारी पूरे देश में चर्चा और चिंता का विषय बन गई है।
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से आ रहे आंकड़े इस बीमारी की गंभीरता को बयां कर रहे हैं। देहरादून के दून अस्पताल के ईएनटी (ENT) विभाग की ओपीडी में हर महीने करीब 20 मरीजों में इस रोग की पुष्टि हो रही है। दून अस्पताल के वरिष्ठ ईएनटी सर्जन डॉ. पीयूष त्रिपाठी ने मीडिया से बातचीत में बताया कि अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अलग-अलग और बेहद चौंकाने वाले कारण सामने आ रहे हैं।

क्या है यह बीमारी?
अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑडियोलॉजी के अनुसार इस बीमारी का वैज्ञानिक नाम सडन सेंसोरिन्यूरल हियरिंग लॉस है। यह कान के भीतर होने वाली एक मेडिकल इमरजेंसी है। जिसमें अमूमन 3 दिन (72 घंटे) या उससे कम समय के भीतर एक या दोनों कानों से सुनाई देना बंद हो जाता है। यह स्थिति तब पैदा होती है जब हमारे कान के आंतरिक हिस्से में मौजूद सुनने के मुख्य अंग कॉकलिया या फिर कान के पर्दे से लेकर मस्तिष्क तक ध्वनि के संकेत पहुंचाने वाली कोकलियर ऑडिटरी नर्व पूरी तरह खराब या क्षतिग्रस्त हो जाती है।
कैसे काम करती हैं कान की नसें और क्यों होता है अटैक?
डॉक्टरों के मुताबिक, हमारे कान में बिजली के तारों के समान दो तरह की नसें होती हैं जिन्हें कोकलियर ऑडिटरी नर्व कहा जाता है। ये नसें कान के अलग-अलग हिस्सों से होते हुए सीधे हमारे मस्तिष्क से जुड़ी होती हैं। जब कोई व्यक्ति अचानक या लंबे समय तक अत्यधिक तेज शोर के संपर्क में आता है या फिर किसी ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाके में पहुंचता है तो ऐसी स्थिति में इन नाजुक नसों पर नकारात्मक असर पड़ता है।
बीमारी की प्रक्रिया समझो
प्रथम चरण:सबसे पहले तेज ध्वनि या दबाव का असर कान के पर्दे पर पड़ता है।
पर्दे में कंपन: इस दबाव की वजह से कान का पर्दा बहुत तेजी से कंपन करने लगता है।
द्रव में तरंगें: कंपन के बहुत तेज होने की वजह से कान के भीतर मौजूद स्टेप्स नामक छोटी हड्डी कॉकलिया के भीतर भरे द्रव में तेज तरंगें पैदा करने लगती है।
हेयर सेल्स का नष्ट होना: इस द्रव में हजारों की संख्या में बेहद सूक्ष्म हेयर कोशिकाएं होती हैं जो ध्वनि तरंगों को विद्युत आवेगों में बदलती हैं। प्रभाव अधिक बढ़ने पर ये कोशिकाएं और नसें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इसके कारण मस्तिष्क तक विद्युत आवेग पहुंचना पूरी तरह बंद हो जाता है और इंसान की सुनने की क्षमता अचानक गायब हो जाती है।

बीमारी के प्रमुख कारण
- हेडफोन और ईयरफोन का अत्यधिक इस्तेमाल:घंटों तक तेज आवाज में कान में हेडफोन या ईयरफोन लगाकर संगीत सुनना या गेमिंग करना इसका सबसे बड़ा कारण बनकर उभर रहा है।
- लापरवाही से ड्रॉप डालना:बिना किसी डॉक्टरी सलाह के बाजार से लाकर कान में लगातार कोई भी ड्रॉप डालना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
- आंतरिक वायरल संक्रमण:कान के भीतर होने वाले कुछ विशेष प्रकार के वायरल या बैक्टीरियल इन्फेक्शन नसों को सीधे नुकसान पहुंचाते हैं।
- रक्त संचार में रुकावट: कॉकलिया तक जाने वाली सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं में थक्का (Blood Clot) जमने या रक्त संचार रुकने से भी इयर स्ट्रोक होता है।
बच्चों में खतरा सबसे अधिक

विशेषज्ञों के मुताबिक वैसे तो यह बीमारी किसी भी आयु वर्ग के लोगों को अपना शिकार बना सकती है लेकिन बच्चों में इसका खतरा बहुत ज्यादा देखा जा रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बच्चों के कान के आंतरिक हिस्से बेहद कोमल और नाजुक होते हैं। इसके अलावा यदि कोई बच्चा दिमागी बुखार या रुबेला जैसी गंभीर बीमारियों की चपेट में आया हो तो उसमें इस नर्व डैमेज का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
गोल्डन ऑवर का रखें ध्यान: इलाज और बचाव
विश्व स्वास्थ्य संगठन और ईएनटी विशेषज्ञों के अनुसार, इस बीमारी में समय सबसे महत्वपूर्ण कारक है। अचानक सुनने की क्षमता कम या शून्य होने के बाद शुरुआती 12 घंटे के भीतर किसी योग्य ईएनटी चिकित्सक को दिखाना अनिवार्य है। यदि मरीज शुरुआती समय में अस्पताल पहुंच जाता है तो कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स दवाओं या इंजेक्शन की मदद से स्थिति को संभाला जा सकता है और सुनने की क्षमता वापस आ सकती है। इलाज में देरी होने पर यह बहरापन स्थायी हो सकता है।
शुरुआती लक्षण जिनपर ध्यान देना जरूरी है
- अचानक कान का भारी हो जाना या ऐसा महसूस होना कि कान में पानी या हवा भर गई है।
- कान में तेज गूंज या सीटी जैसी आवाज आना जिसे चिकित्सा में टिनिटस कहते हैं।
- अचानक से चक्कर आना या शरीर का संतुलन बिगड़ना।










