राज्य गठन के बाद मत्स्य पालन के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई है। राज्य में पहली बार उच्च हिमालयी क्षेत्रों में उत्पादित होने वाली बहुमूल्य रेनबो ट्राउट मछली ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मजबूत दस्तक दी है। पिथौरागढ़ जिले के अत्यंत दुर्गम धारचूला और मुनस्यारी क्षेत्र की तीन स्थानीय मत्स्य सहकारी समितियों द्वारा उत्पादित पांच मीट्रिक टन रेनबो ट्राउट मछली का पहला सफल व्यावसायिक निर्यात पड़ोसी देश नेपाल के लिए किया गया है। मत्स्य विभाग ने इस निर्यात शृंखला को आगे बढ़ाते हुए आने वाले दिनों में नेपाल को 30 टन अतिरिक्त मछली भेजने की तैयारी भी शुरू कर दी है।
राज्य सचिवालय स्थित मीडिया सेंटर में पत्रकारों से औपचारिक बातचीत करते हुए प्रदेश के मत्स्य विकास मंत्री सौरभ बहुगुणा ने इस ऐतिहासिक सफलता की विस्तृत जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि इस अंतरराष्ट्रीय निर्यात को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण ढंग से संपन्न करने के लिए आधुनिक कोल्ड चेन प्रबंधन का विशेष ध्यान रखा गया। पहाड़ों से निकाली गई इन ताजी मछलियों को खराब होने से बचाने के लिए सबसे पहले उत्तराखंड से गुजरात के वेरावल बंदरगाह भेजा गया था। वेरावल स्थित अत्याधुनिक प्रसंस्करण इकाइयों में अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रोसेसिंग और पैकेजिंग का कार्य पूरा होने के बाद, बीते 23 जून को इस पूरी खेप को सफलतापूर्वक नेपाल के वाणिज्यिक बाजारों में उतारा गया। इस पूरी मुहिम से सीमांत क्षेत्र के लगभग 33 स्थानीय मत्स्य पालकों को सीधे तौर पर करीब 23.50 लाख रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हुई है जिससे उनके जीवन स्तर में व्यापक सुधार देखने को मिलेगा।

मत्स्य विकास मंत्री ने विभाग की इस बड़ी सफलता के पीछे के वित्तीय और ढांचागत सहयोग को रेखांकित करते हुए कहा कि मत्स्य विभाग ने इस पूरी मुहिम को अमलीजामा पहनाने के लिए पैकेजिंग, फ्रोजन स्टोरेज और परिवहन व्यवस्था के लिए 5.40 लाख रुपये की गैप फंडिंग सहायता प्रदान की थी। उन्होंने कहा कि इस अंतरराष्ट्रीय सफलता की नींव दरअसल दुबई में आयोजित हुए प्रसिद्ध गल्फ फूड एक्सपो के दौरान पड़ी थी जहां उत्तराखंड के प्रतिनिधिमंडल को कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संपर्क और निर्यात के अवसर मिले थे। नेपाल में इस पहली खेप की भारी मांग को देखते हुए अब मत्स्य विभाग की नजरें आने वाले समय में यूरोप, मध्य पूर्व (खाड़ी देशों) और दक्षिण-पूर्व एशिया के विशाल और प्रीमियम बाजारों पर टिकी हैं जहां उत्तराखंड की ट्राउट मछली को पहुंचाने के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जा रही है।
मत्स्य क्षेत्र में रिकॉर्ड-दर-रिकॉर्ड वृद्धि
- बजट में भारी उछाल: वर्ष 2021-22 में विभाग का बजट जो मात्र 55.76 करोड़ रुपये था, वह अब बढ़कर रिकॉर्ड 261.41 करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है।
- रोजगार के नए अवसर: बीते चार वर्षों में राज्य के भीतर 5,646 मत्स्य पालकों के लिए प्रत्यक्ष तौर पर रोजगार के नए अवसर सृजित किए गए हैं।
- उत्पादन की रफ्तार: राज्य में मत्स्य उत्पादन की वार्षिक वृद्धि दर दो प्रतिशत के सामान्य स्तर से छलांग लगाकर अब 11 प्रतिशत के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गई है।
- महिला भागीदारी: वर्तमान में कुल 15,657 मत्स्य पालकों में से 3,584 महिला उद्यमी इस क्षेत्र को सुदृढ़ कर रही हैं।
गेम चेंजर साबित हो रही मुख्यमंत्री मत्स्य संपदा योजना

सौरभ बहुगुणा ने कहा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कुशल नेतृत्व में प्रदेश के भीतर चलाई जा रही मुख्यमंत्री मत्स्य संपदा योजना और नवीन ट्राउट प्रोत्साहन योजना मत्स्य पालकों के लिए गेम चेंजर साबित हो रही हैं। इन योजनाओं के तहत पर्वतीय क्षेत्रों के युवाओं और महिलाओं को मत्स्य पालन अपनाने के लिए बड़ी सब्सिडी, तकनीकी प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे पलायन की समस्या पर भी प्रभावी रोक लग रही है। नीतियों में किए गए इन बुनियादी सुधारों के कारण ही राज्य में मछली उत्पादकों की संख्या वर्ष 2022 के 10,011 से बढ़कर अब 15,657 तक पहुंच गई है, जिसमें 3,584 महिलाओं की सक्रिय भागीदारी महिला सशक्तिकरण की नई गाथा लिख रही है। इस चालू वित्तीय वर्ष में राज्य के भीतर कुल 11,805 मीट्रिक टन मत्स्य उत्पादन दर्ज किया गया है, जिसका कुल बाजार मूल्य लगभग 165 करोड़ रुपये आंका गया है। अंतरराष्ट्रीय निर्यात के अलावा घरेलू स्तर पर सुरक्षा बलों के साथ हुए ऐतिहासिक समझौतों का जिक्र करते हुए अधिकारियों ने बताया कि वर्ष 2024 में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के साथ किए गए एक विशेष करार के तहत अब तक सीमावर्ती चौकियों पर तैनात जवानों के लिए 2.10 करोड़ रुपये मूल्य की लगभग 45.10 मीट्रिक टन उच्च गुणवत्ता वाली ट्राउट मछली की सुरक्षित आपूर्ति सफलतापूर्वक की जा चुकी है। इस अवसर पर सचिवालय के मीडिया सेंटर में मत्स्य विभाग के निदेशक मत्स्य चंद्र सिंह धर्मशक्तू सहित विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारी और विशेषज्ञ भी मौजूद रहे, जिन्होंने इस सफलता को राज्य के कृषि और संबद्ध क्षेत्र के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय करार दिया।










