हिमालयी राज्यों उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में हर साल विकराल रूप धारण करने वाली जंगल की आग से निपटने के लिए लागू मौजूदा तकनीकी और प्रशासनिक ढांचा अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (एफएसआई) की ओर से जारी होने वाले सैटेलाइट फायर अलर्ट्स की विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, चालू फायर सीजन के दौरान जारी किए गए कुल 4,879 अलर्ट में से महज 12.5 प्रतिशत अलर्ट ही धरातल पर वास्तविक पाए गए। शेष लगभग 87.5 फीसदी अलर्ट ऐसे स्थानों से दर्ज किए गए जहां वन क्षेत्रों में कोई आग ही नहीं लगी थी।
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी संसदीय समिति ने इस पूरी स्थिति पर गहरी नाराजगी और चिंता व्यक्त की है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी है कि गलत और भ्रामक अलर्ट की इतनी बड़ी संख्या जमीनी अधिकारियों के व्यवहार पर नकारात्मक असर डाल रही है। बार-बार गलत सूचनाएं मिलने के कारण वन विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों में अलर्ट संदेशों को हलके में लेने की प्रवृत्ति पनप रही है। इसका सीधा दुष्परिणाम यह हो सकता है कि जब वास्तव में कहीं भीषण आग लगेगी, तब भी विभागीय टीम उसे गलत अलर्ट मानकर समय पर कार्रवाई करने से चूक सकती है।
विश्लेषण में यह बात सामने आई है कि एफएसआई के सैटेलाइट सिस्टम में मिलने वाले अधिकांश गलत अलर्ट्स के पीछे गैर-वन क्षेत्रों में खेतों की पराली या कूड़ा जलाया जाना, नियंत्रित तरीके से लगाई गई विभागीय आग या फिर तकनीकी डेटा संबंधी त्रुटियां जिम्मेदार हैं। संसद की स्थायी समिति का मानना है कि भारत के पास जंगल की आग को रोकने के लिए पर्याप्त नीतियां, अत्याधुनिक तकनीक और बजट उपलब्ध है लेकिन सबसे बड़ी खामी इनके व्यावहारिक और सटीक इस्तेमाल में दिखाई दे रही है।
विदेशी उपग्रहों के भरोसे देश के जंगल, मॉनिटरिंग में 18 घंटे का ब्लैकआउट

संसदीय समिति ने जंगल की आग की सतत निगरानी की मौजूदा भारतीय प्रणाली की खामियों को उजागर किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर परचम लहराने के बावजूद, भारत अपने जंगलों की आग पर नजर रखने के लिए आज भी विदेशी सैटेलाइट्स पर निर्भर है। इस विदेशी निर्भरता के कारण देश के वन क्षेत्रों पर 24 घंटे निरंतर निगरानी संभव नहीं हो पा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में मॉनिटरिंग चक्र में दिनभर में करीब 18 घंटे का विशाल अंतराल (गैप) रहता है। पहला बड़ा गैप देर रात 1:30 बजे से सुबह 10:30 बजे तक (9 घंटे) और दूसरा बड़ा गैप दोपहर 1:30 बजे से रात 10:30 बजे तक (9 घंटे) रहता है। इन संवेदनशील घंटों के दौरान यदि जंगलों में आग सुलगती है या फैलती है, तो कई घंटों तक उसकी सूचना किसी भी स्तर पर दर्ज नहीं हो पाती। जब तक सैटेलाइट डेटा उपलब्ध होता है, तब तक आग काबू से बाहर होकर विशाल क्षेत्र को स्वाहा कर चुकी होती है।
इसे देखते हुए संसदीय समिति ने अंतरिक्ष विभाग को निर्देश दिया है कि वह प्राथमिकता के आधार पर एक ऐसा स्वदेशी डेडिकेटेड सैटेलाइट डिजाइन और लॉन्च करे, जो विशेष रूप से हिमालयी राज्यों के दुर्गम पहाड़ी इलाकों पर 24 घंटे सीधी और निर्बाध नजर रख सके। इसके साथ ही समिति ने जोर दिया है कि सरकार को आग बुझाने के बजटीय खर्च से ज्यादा ध्यान आग की रोकथाम और जले हुए वनों के पुनर्निर्माण (रेस्टोरेशन) पर देना चाहिए।
बजटीय आवंटन और घटती सटीकता का गणित

जंगल की आग के प्रति त्वरित सूचना तंत्र से देश भर के लगभग 4.74 लाख लोग और वनाधिकारी सीधे रजिस्टर्ड हैं। केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2020-21 से 2025-26 की अवधि के बीच राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को फॉरेस्ट फायर प्रिवेंशन एंड मैनेजमेंट योजना के तहत कुल 186.81 करोड़ की भारी-भरकम सहायता राशि वितरित की है। इस कुल फंड में से पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश को 59.59 करोड़ और उत्तराखंड को 54.56 करोड़ रुपये की वित्तीय मदद मुहैया कराई गई है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर सूचनाओं की सटीकता में भारी कमी और फर्जी अलर्ट की भरमार यह दर्शाती है कि आवंटित फंड और संसाधनों का सही तकनीकी उपयोग नहीं हो पा रहा है।
संसदीय समिति की 4 प्रमुख सिफारिशें
- स्वदेशी 24/7 सैटेलाइट: अंतरिक्ष विभाग तुरंत हिमालयी क्षेत्रों के लिए विशेष उपग्रह लॉन्च करे जो बिना किसी टाइम-गैप के जंगलों पर 24 घंटे नजर रखे।
- सटीक अलर्ट फिल्टरेशन: एफएसआई अपने डेटा एल्गोरिदम को सुधारे ताकि खेतों की आग और गैर-वन क्षेत्रों के डेटा को फिल्टर कर केवल वास्तविक अलर्ट भेजे जाएं।
- रोकथाम पर प्राथमिक फोकस: बजट का बड़ा हिस्सा केवल आग लगने के बाद उसे बुझाने पर खर्च करने के बजाय आग लगने से रोकने (प्रिवेंशन) के उपायों पर लगाया जाए।
- इको-रेस्टोरेशन नीति: दावानल की चपेट में आकर नष्ट हुए संवेदनशील हिमालयी वन क्षेत्रों को पुनः हरा-भरा और स्वस्थ बनाने के लिए दीर्घकालिक पुनर्निर्माण योजना लागू की जाए।










