समाज में डॉक्टरों को अक्सर दो नजरियों से देखा जाता है। एक तरफ वे लोग हैं जो डॉक्टर को भगवान का दूसरा रूप मानते हैं वहीं दूसरी तरफ स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते व्यवसायीकरण के कारण डॉक्टरों को लेकर अविश्वास और शिकायतें भी बढ़ी हैं। इन दोनों धारणाओं के बीच कुछ ऐसे डॉक्टर भी हैं जो बिना किसी प्रचार और चर्चा के अपने पेशे को सेवा का माध्यम बनाकर काम कर रहे हैं। ऐसा ही एक नाम है डॉ. अविरल डोभाल… एक युवा ऑर्थोपेडिक सर्जन। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने यह सामाजिक पहल अपने करियर के अंतिम पड़ाव में नहीं बल्कि पेशेवर जीवन के शुरुआती वर्षों में ही शुरू कर दी। वर्ष 2021 में उन्होंने मेदिका फाउंडेशन की स्थापना की। हर सुबह लगभग दो घंटे वे जरूरतमंद लोगों के लिए समर्पित करते हैं। यहां मरीजों से केवल पांच रुपये का पंजीकरण शुल्क लिया जाता है जबकि परामर्श निशुल्क रहता है। जीएमसी हल्द्वानी से एमबीबीएस, उसके बाद ऑर्थोपेडिक सर्जरी में विशेषज्ञता, स्पोर्ट्स मेडिसिन और जॉइंट रिप्लेसमेंट में प्रशिक्षण हासिल करने वाले डॉ.अविरल मानते हैं कि डॉक्टर का असली कर्तव्य केवल बीमारी का इलाज करना नहीं बल्कि मरीज के मन में भरोसा पैदा करना भी है। वह चुपचाप अपना काम करते जा रहे हैं। ‘अतुल्य उत्तराखंड’ की खास सीरीज ‘उत्तराखंड के साइलेंट हीरो’ में कहानी एक युवा सोच की…
एक सफल करियर के बीच समाजसेवा का विचार कहां से आया?
जब आप रोजाना अलग-अलग परिस्थितियों से आए लोगों को देखते हैं तो समझ में आता है कि बीमारी सिर्फ शारीरिक समस्या नहीं होती। कई बार आर्थिक परेशानी बीमारी से भी बड़ी समस्या बन जाती है। सरकारी अस्पतालों में काम करते हुए मैंने देखा कि कई मरीज इलाज से ज्यादा खर्चे को लेकर परेशान रहते हैं। कई लोग समय पर इलाज नहीं करा पाते। कुछ लोग दवा खरीदने में सक्षम नहीं होते। कुछ जांचें नहीं करा पाते। इन अनुभवों ने मुझे सोचने पर मजबूर किया। मुझे लगा कि अगर मैं अपने समय का थोड़ा हिस्सा समाज के लिए समर्पित कर सकता हूं तो जरूर करना चाहिए।
प्रतिदिन कितने मरीज आते हैं?
आमतौर पर दो घंटे में 50 से 60 मरीज देख लेता हूं। कभी-कभी संख्या इससे ज्यादा भी हो जाती है। इनमें बुजुर्ग, मजदूर, महिलाएं और दूर-दराज क्षेत्रों से आने वाले लोग शामिल होते हैं। कई मरीज ऐसे भी होते हैं जो वर्षों से दर्द झेल रहे होते हैं, लेकिन आर्थिक कारणों से विशेषज्ञ डॉक्टर तक नहीं पहुंच पाए होते।
मेदिका फाउंडेशन की शुरुआत कैसे हुई?
साल 2021 में हमने मेदिका फाउंडेशन की स्थापना की। शुरुआत बहुत छोटी थी। हमारे पास कोई बड़ी योजना नहीं थी। बस यह विचार था कि जरूरतमंद लोगों के लिए एक ऐसा स्थान बनाया जाए जहां वे सम्मान के साथ चिकित्सा सलाह ले सकें। हमने पांच रुपये का पंजीकरण शुल्क रखा ताकि व्यवस्था बनी रहे लेकिन परामर्श शुल्क नहीं रखा। कोशिश रहती है कि मरीजों को सस्ती दवाइयां और जहां तक संभव हो कम लागत वाली जांच सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएं। जिन मरीजों को ऑपरेशन की जरूरत होती है उन्हें कुछ ऐसे अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है, जहां पर कम पैसे लगे। मैं अपनी फीस माफ कर सकता हूं लेकिन अस्पताल का अन्य खर्च मरीजों को देना होता है। इसलिए हम लोगों को आयुष्मान कार्ड बनवाने की सलाह देता हूं। मुश्किल वक्त में यह बहुत काम आता है। आयुष्मान कार्ड से कई लोगों को इलाज में आसानी हुई है। इससे हमारी कोशिश को भी मदद मिली है।
इतनी व्यस्त पेशेवर जिंदगी के बीच यह काम करना कितना कठिन है?
कठिन तो है लेकिन असंभव नहीं। यदि मन में इच्छा हो तो समय निकाला जा सकता है। सच कहूं तो इस काम को जारी रखने में मेरे परिवार और संस्थान का बहुत बड़ा योगदान है। मेरी पत्नी भी डॉक्टर हैं। उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया। परिवार का सहयोग न हो तो इस तरह की पहल को लंबे समय तक चलाना मुश्किल होता है।
क्या कभी लगा कि यह सेवा बंद करनी पड़ सकती है?
शुरुआती दिनों में यह चिंता जरूर थी, क्योंकि किसी भी सामाजिक पहल को चलाने के लिए संसाधनों की जरूरत होती है। लेकिन समय के साथ लोगों का सहयोग मिलता गया। आज भी चुनौतियां हैं, लेकिन अब यह काम मेरी दिनचर्या और जीवन-दृष्टि का हिस्सा बन चुका है। इसलिए इसे बंद करने का विचार नहीं आता। बल्कि इसे आगे बढ़ाने के बारे में सोचता हूं।
अपनी शैक्षणिक और पेशेवर यात्रा के बारे में बताइए?
मेरी प्रारंभिक शिक्षा उत्तराखंड में ही हुई। स्कूल के दिनों से ही विज्ञान विषयों में रुचि थी। 12वीं के बाद मैंने मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी की और चयन होने के बाद जीएमसी हल्द्वानी में प्रवेश मिला। वहां पढ़ाई करना मेरे लिए गर्व की बात थी। एमबीबीएस के बाद मैंने ऑर्थोपेडिक्स में डीएनबी की। इसके लिए मुझे जयपुर जाने का अवसर मिला। वहां प्रशिक्षण के दौरान मैंने न केवल चिकित्सा विज्ञान सीखा बल्कि यह भी समझा कि एक डॉक्टर के सामने मरीज केवल एक केस नहीं होता, बल्कि एक पूरा परिवार और उसकी उम्मीदें होती हैं। इसके बाद मैंने विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में कार्य किया, फेलोशिप की, स्पोर्ट्स मेडिसिन में डिप्लोमा किया और जॉइंट रिप्लेसमेंट तथा लिगामेंट रिकंस्ट्रक्शन जैसे क्षेत्रों में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया। ऋषिकेश और श्रीनगर मेडिकल कॉलेज में भी लंबे समय तक काम किया।
अगर डॉक्टर नहीं बनते तो क्या बनते?
12वीं के बाद मेरे पास इंजीनियरिंग और मेडिकल दोनों विकल्प थे। मेरे पिता चाहते थे कि मैं इंजीनियर बनूं। मैंने इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाएं भी दी थीं और चयन भी हो गया था। लेकिन कहीं न कहीं मेरा मन चिकित्सा क्षेत्र में ज्यादा लगता था। मुझे लगता था कि यह ऐसा पेशा है जहां ज्ञान का उपयोग सीधे किसी इंसान के जीवन को बेहतर बनाने में होता है। शायद यही वजह रही कि मैंने मेडिकल क्षेत्र को चुना। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि निर्णय सही था, क्योंकि मुझे अपने काम में संतोष मिलता है।

क्या किसी मरीज की कहानी आज भी याद है?
ऐसी अनेक कहानियां हैं। कई मरीज ऐसे मिले जिन्होंने पहले विश्वास ही नहीं किया कि इतनी कम फीस में विशेषज्ञ डॉक्टर उन्हें देख सकता है। जब कोई मरीज इलाज के बाद ठीक होकर मुस्कुराते हुए धन्यवाद कहता है, तो वह अनुभव शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। डॉक्टर के लिए वही सबसे बड़ा पुरस्कार होता है।
क्या कभी लगा कि लोग आपकी इस पहल को गलत नजर से देखते हैं?
हां, कुछ लोग सवाल उठाते हैं। उन्हें लगता है कि इसके पीछे कोई प्रचार या दूसरा उद्देश्य होगा। लेकिन समाज में यह हर अच्छे काम के साथ होता है। मैं मानता हूं कि यदि आपकी नीयत साफ है तो आलोचनाओं से ज्यादा प्रभावित नहीं होना चाहिए। आखिरकार आपका काम ही आपकी पहचान बनाता है।
डॉक्टरों को लेकर समाज में जो नकारात्मक धारणा बनी है, उस पर आपका क्या कहना है?
हर पेशे की तरह चिकित्सा क्षेत्र में भी कुछ अपवाद हो सकते हैं। लेकिन कुछ लोगों के आधार पर पूरे समुदाय को गलत ठहराना उचित नहीं है। आज डॉक्टरों पर पहले से कहीं अधिक दबाव है। मरीजों की संख्या बढ़ रही है। अपेक्षाएं बढ़ रही हैं और संसाधन कई जगह सीमित हैं। इसके बावजूद अधिकांश डॉक्टर ईमानदारी से काम कर रहे हैं। मेरा मानना है कि डॉक्टर और मरीज के बीच विश्वास बना रहना चाहिए। यही अच्छे उपचार की नींव है।
डॉक्टर और मरीज के रिश्ते में सबसे जरूरी चीज क्या है?
संवेदनशीलता। कई बार मरीज को दवा से पहले सहानुभूति की जरूरत होती है। यदि डॉक्टर मरीज की बात ध्यान से सुन ले, उसे सम्मान दे और उसकी चिंता को समझे, तो आधा उपचार वहीं से शुरू हो जाता है। मैं युवा डॉक्टरों से भी यही कहता हूं कि मरीज को सिर्फ एक मेडिकल केस के रूप में न देखें।
उत्तराखंड के स्वास्थ्य ढांचे में आपको सबसे बड़ी चुनौती क्या दिखाई देती है?
पहाड़ी क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाओं की कमी अब भी बड़ी चुनौती है। कई स्थानों पर मरीजों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। हालांकि स्थिति पहले से बेहतर हुई है लेकिन अभी बहुत काम बाकी है। विशेष रूप से विशेषज्ञ डॉक्टरों, आधुनिक उपकरणों और आपातकालीन सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाने की जरूरत है।
लोग आपको हीरो मानते हैं, आप खुद को किस रूप में देखते हैं?
मैं खुद को हीरो नहीं मानता। मैं सिर्फ अपना कर्तव्य निभाने की कोशिश कर रहा हूं। यदि मेरे दो घंटे किसी जरूरतमंद व्यक्ति की जिंदगी आसान बना सकते हैं तो यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है। जो कुछ कर पा रहा हूं वह ईश्वर की कृपा, परिवार के सहयोग और मरीजों के विश्वास की वजह से संभव है।
डॉक्टर संख्या बढ़ाने के लिए नहीं बनाए जा सकते
मेरा मानना है कि चिकित्सा शिक्षा में गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। डॉक्टर केवल संख्या बढ़ाने के लिए नहीं बनाए जा सकते। यह ऐसा पेशा है जिसमें ज्ञान के साथ संवेदनशीलता और नैतिकता भी जरूरी है। यदि गुणवत्ता प्रभावित होती है तो उसका असर सीधे मरीजों पर पड़ता है। इसलिए मेडिकल शिक्षा में मानकों को मजबूत रखना बहुत आवश्यक है।
मेडिकल सिर्फ व्यवसाय नहीं
चिकित्सा को सिर्फ व्यवसाय की तरह मत देखिए। यह एक जिम्मेदारी है। आपने जो ज्ञान हासिल किया है, उसका लाभ समाज तक पहुंचना चाहिए। पैसा महत्वपूर्ण है लेकिन मरीज का विश्वास उससे कहीं अधिक मूल्यवान है। जब कोई मरीज आपको धन्यवाद देता है तो वह संतोष किसी भी आर्थिक उपलब्धि से बड़ा होता है।










