Chhattisgarh और उत्तराखंड एक ही कालखंड में अस्तित्व में आए। दोनों राज्य अपनी 25 साल की यात्रा पूरी कर चुके हैं। दो अलग-अलग भौगोलिक और प्राकृतिक विरासत वाले राज्यों ने इन 25 वर्षों में क्या हासिल किया है, विकास की राह में क्या कोशिशें हुई हैं और किन क्षेत्रों में अभी और काम की जरूरत है, इन्हीं पहलुओं को करीब से समझने के लिए उत्तराखंड की मीडिया का एक दल 5 दिन के स्टडी टूर पर छत्तीसगढ़ पहुंचा है।
पत्र सूचना कार्यालय (PIB) की पहल पर आयोजित इस मीडिया दौरे में छत्तीसगढ़ की विकास यात्रा को जमीन पर समझने का अवसर मिलेगा। किसी राज्य को सिर्फ राजधानी की चकाचौंध से नहीं समझा जा सकता। उसके लिए उन इलाकों तक जाना पड़ता है, जहां कारखाने चलते हैं, खदानों से संसाधन निकलते हैं, बिजली बनती है और इन्हीं गतिविधियों के आसपास हजारों लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी होती है। छत्तीसगढ़ को समझने की कोशिश भी इसी नजरिए से की जा रही है।
इस दौरे में राज्य के महत्वपूर्ण औद्योगिक और सार्वजनिक उपक्रमों को करीब से देखने और उनके कामकाज को समझने का अवसर मिलेगा। इस टूर में बिलासपुर में SECL, कोरबा में BALCO और NTPC जैसे प्रमुख संस्थानों का दौरा शामिल है। इसके अलावा इस टूर में 40 किलोवाट की सौर परियोजना, जनजातीय संग्रहालय सिरपुर और स्वयं सहायता समूहों के काम को भी करीब से देखने का अवसर मिलेगा।

SECL, BALCO और NTPC…ये तीनों संस्थान अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं, लेकिन इनके काम को एक साथ देखने पर छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था की एक महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आती है, खनिज, ऊर्जा और उद्योग का आपसी तालमेल। छत्तीसगढ़ की पहचान लंबे समय से उसकी खनिज संपदा से जुड़ी रही है। कोयला और दूसरे खनिज यहां की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार हैं। लेकिन किसी खनिज का जमीन से निकलना कहानी का अंत नहीं, बल्कि एक लंबी औद्योगिक प्रक्रिया की शुरुआत है।
कोयला बिजली उत्पादन तक पहुंचता है। बिजली उद्योग को गति देती है। खनिज से धातु और धातु से तैयार उत्पाद तक की यात्रा में तकनीक, निवेश, मानव संसाधन और बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर जुड़ते हैं। इसी पूरी श्रृंखला को करीब से देखने का अवसर इस दौरे में मिलेगा।
SECL के माध्यम से कोयला खनन की प्रक्रिया और उसकी भूमिका को समझने का मौका होगा। वहीं NTPC ऊर्जा क्षेत्र की उस कड़ी को सामने रखता है, जिसके बिना औद्योगिक विकास की कल्पना मुश्किल है। BALCO खनिज संसाधनों के औद्योगिक उपयोग और एल्युमिनियम उत्पादन की दुनिया को समझने का अवसर देगा। इन उपक्रमों की कहानी सिर्फ उत्पादन तक सीमित नहीं है। इनके आसपास रहने वाले लोगों की जिंदगी में इनका क्या असर पड़ा है, इसे समझना भी इस मीडिया दौरे का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
बड़े उद्योग किसी क्षेत्र का आर्थिक परिदृश्य बदल सकते हैं। उनके साथ रोजगार आते हैं, स्थानीय बाजार बढ़ते हैं और सड़क, परिवहन तथा दूसरी सुविधाओं की जरूरत भी बढ़ती है। लेकिन विकास का वास्तविक असर जानने के लिए यह देखना जरूरी है कि स्थानीय समाज इस बदलाव को किस तरह महसूस करता है।
क्या स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़े हैं? क्या आसपास के गांवों को बेहतर सुविधाएं मिलीं? क्या उद्योगों और स्थानीय समुदाय के बीच संवाद पुख्ता हुआ? और क्या विकास के साथ पर्यावरण को लेकर जरूरी सावधानियां भी उतनी ही गंभीरता से अपनाई जा रही हैं? इन सवालों के जवाबों को खोजना इस दौरे की विशेषता रहेगी।
यह महज औद्योगिक दौरा या महत्वपूर्ण संयंत्रों की विजिट भर नहीं है। यह उन कहानियों को समझने का अवसर भी है, जो अक्सर बड़ी परियोजनाओं के आसपास धीरे-धीरे आकार लेती हैं।
छत्तीसगढ़ जैसे संसाधन संपन्न राज्य के सामने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का सवाल भी स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है। खनन और उद्योग आर्थिक गतिविधियों को रफ्तार देते हैं, लेकिन इनके साथ प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय समुदायों से जुड़े सवाल भी सामने आते हैं। इसलिए विकास की तस्वीर को पूरी तरह समझने के लिए उसके आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय पहलुओं को एक साथ देखना जरूरी है।
इस दौरे के दौरान राज्य सरकार, औद्योगिक एवं सार्वजनिक उपक्रमों के प्रतिनिधियों और मुख्यमंत्री से मुलाकात भी प्रस्तावित है। इससे छत्तीसगढ़ के विकास को लेकर सरकार की प्राथमिकताओं को समझने का अवसर मिलेगा। औद्योगिक निवेश से लेकर रोजगार, बुनियादी ढांचे और जनकल्याण तक, राज्य किस दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, इसे जानना इस दौरे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड की परिस्थितियां अलग हैं। एक राज्य की पहचान विस्तृत मैदानी और वन क्षेत्रों के साथ खनिज संपदा से जुड़ी है, तो दूसरे की पहचान पहाड़, जंगल, जलस्रोत और पर्यटन से। ऐसे में दोनों राज्यों की विकास यात्रा की तुलना करना आसान नहीं है। लेकिन 25 साल की यात्रा के पड़ावों को समझना निश्चित रूप से एक-दूसरे से सीखने का अवसर दे सकता है।
छत्तीसगढ़ को दूर से देखने और उसके विकास को जमीन पर जाकर समझने में फर्क है। यह दौरा उसी फर्क को समझने की एक कोशिश है।
पीआईबी चयनित परियोजना स्थलों पर ऐसे प्रेस टूर आयोजित करता है ताकि पत्रकार देश में चल रही विकास गतिविधियों का सीधा लेखा-जोखा ले सकें और उनकी व्यापक जनहित और राष्ट्रहित की उपयोगिता को परख सकें। पीआईबी देहरादून द्वारा आयोजित छत्तीसगढ़ प्रेस टूर के कंडक्टिंग ऑफिसर संजीव सुंद्रियाल ने कहा, यह प्रेस टूर उत्तराखंड के पत्रकारों को केंद्र सरकार की विकास परियोजनाओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इससे राज्य के पत्रकारों को छत्तीसगढ़ में केंद्र सरकार की उपलब्धियों की गहन, सटीक और स्पष्ट जानकारी मिलेगी।
सुंद्रियाल ने बताया कि इस प्रेस टूर का उद्देश्य है, पत्रकारों को विभिन्न राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं, संस्थानों एवं गतिविधियों का ज़मीनी स्तर पर प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हो सके। राष्ट्रीय प्रेस टूर का प्राथमिक उद्देश्य क्षेत्रीय मीडिया और राष्ट्रीय स्तर की विकासात्मक प्राथमिकताओं के बीच एक मजबूत सेतु का निर्माण करना है। इस अध्ययन यात्रा से उत्तराखंड के पत्रकारों को देश की अत्याधुनिक तकनीकी और बुनियादी ढांचे की प्रगति को करीब से देखने और समझने का अवसर मिलेगा। हमारा प्रयास है कि इस एक्सपोजर टूर के माध्यम से मीडिया प्रतिनिधि जमीनी स्तर पर हो रहे बदलावों और नवाचारों का गहन विश्लेषण कर पाठकों तक सटीक और प्रामाणिक जानकारी पहुंचा सकें। समय-समय पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत पीआईबी देहरादून द्वारा ऐसे प्रेस टूर आयोजित किए जा रहे हैं साथ ही पीआईबी देहरादून की तरफ से इससे पहले भी हैदराबाद, उडीसा, विशाखापट्टनम प्रेस टूर आयोजित किए गए हैं।
इस टूर में उत्तराखंड के 11 पत्रकार शामिल हैं, इनमें वरिष्ठ पत्रकार विनोद मुसान, बिशन सिंह बोरा, मनमोहन लखेड़ा, अरविंद सिंह, किरण शर्मा, जितेंद्र, दरबान सिंह, कृष्णकांत, योगेश शैली, कुलदीप चौहान और अर्जुन सिंह रावत शामिल हैं। यह दल देहरादून से दिल्ली होते हुए रायपुर पहुंचा।










