उत्तराखंड की राजनीति के शिखर पुरुषों में शुमार पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल (रिटा.) भुवन चंद्र खंडूड़ी (91 वर्ष) के निधन के बाद उनकी बेटी और उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी भूषण ने अपने दिवंगत पिता की स्मृति में एक बेहद भावुक कविता साझा की है जिसे पढ़कर हर किसी का दिल भर आया।
ऋतु खंडूड़ी ने अपने पिता को खोने के दर्द और उनके आदर्शों को समेटते हुए इस कविता के जरिए श्रद्धांजलि अर्पित की है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री रहते हुए देश में स्वर्णिम चतुर्भुज योजना को धरातल पर उतारने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। पिता के जाने के बाद ऋतु खंडूड़ी भावुक हैं। उनकी मौत के बाद उन्होंने कहा था कि मैंने सिर्फ एक राजनेता नहीं बल्कि अपना सबसे बड़ा मार्गदर्शक और पिता खोया है। उनके सिखाए अनुशासन और सादगी के रास्ते पर चलना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

ऋतु खंडूड़ी का अपने पिता को काव्यांजलि
जय और दुर्गा की गोद से, एक शेर निकल कर आया था,
भारत मां के चरणों में, जीवन उसने चढ़ाया था।
वो पहाड़ का सिपाही और माटी का लाल था,
सीमा पर वो डटा रहा, दुश्मनों का काल था।
तीन-तीन रण देखे उसने, धधकते युद्धों की आग में,
सीना तान के खड़ा रहा वो, तिरंगे की शान में।
गोली, बारूद, अंधियारे सब, उसके आगे हार गए,
वो देश पे मरना सीख गया, उससे भय भी पार गए।
वो पहाड़ का सिपाही था, देश उसका अभिमान था,
ईमानदारी की राजनीति में, जैसे कोई भगवान था।
फिर आया वो जनता में, सत्ता उसके लिए नहीं,
सेवा ही उसका धर्म रही, कुर्सी की कोई चीत नहीं।
जब समझौतों का दौर चला, वो पर्वत सा अड़ा रहा,
ना पद झुका, ना मन डिगा, वो कर्मठ खड़ा रहा।
पहाड़ की टूटी राहों में, उसने अपना कल देखा था,
हर सूने गांव के चेहरे पर, विकास का संबल देखा था।
उत्तराखंड के हर आंसू को, उसने अपना मान लिया,
जनता का सेवक बन, जनमन का अभियान लिया।
राहें केवल पत्थर भर नहीं, राष्ट्र-धर्म की डोरी थीं,
अटल संकल्पों की ज्योति लिए, उसकी आंखें भोरि थीं।
‘जनरल, देश जोड़ दो’ का जब, अटल पुकार ने स्वर पाया,
स्वर्णिम चतुर्भुज बनकर फिर, भारत ने नव पथ अपनाया।
ईस्ट-वेस्ट, नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर से, भारत का विस्तार जुड़ा,
गांव-गांव तक सड़क पहुंचाकर, जनजीवन का संसार जुड़ा।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क से, सपनों को भी राह मिली,
दूर पहाड़ों की चौखट पर, विकास की पहली चाह मिली।
और फिर वो दिन भी आया, जब शोर बहुत था, खेल बड़े
सच अकेला खड़ा रहा था, चेहरे कई थे, मेल बड़े।
कोटद्वार की धरती पूछे- क्या हार गया था वो सच में?
या कपट और चालों वाले, जीते थे छल के रथ में?
चुनाव भले ही हार गया, चरित्र नहीं हारा वो,
जनता के दिल में बसने वाला और चमका सितारा वो।
आज हिमालय भी चुप होगा, गंगा भी बहती रोती होगी,
खंडूड़ी की सांस बंद हुई तो अरुणा भी उनको खोती होगी।










