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    उत्तराखंड 360

    डॉ. लक्ष्मी रावत… जैविक खेती की पैरोकार

    महिला दिवस विशेषांक में हम परिचय करा रहे हैं पहाड़ की उस प्रतिबद्ध वैज्ञानिक से जिन्होंने शोध को सिर्फ प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहने दिया बल्कि उसे खेतों और हमारी थाली की सेहत से जोड़ा। डॉ. लक्ष्मी रावत। कृषि महाविद्यालय रानीचौरी की वैज्ञानिक। लंबे समय से रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों और उसके टिकाऊ विकल्पों पर शोध कर रही हैं। उनका मानना है कि आधुनिक कृषि में बढ़ता सिस्टमैटिक रसायनों का प्रयोग मिट्टी, फसल और मानव स्वास्थ्य तीनों के लिए खतरे की घंटी है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मानित डॉ. रावत आज पहाड़ के किसानों की उम्मीद, सुरक्षित खेती की पैरोकार और आने वाली पीढ़ियों की सेहत की सजग प्रहरी के रूप में उभरी हैं।
    teerandajBy teerandajMarch 8, 2026Updated:March 8, 2026No Comments
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    • अतुल्य उत्तराखंड ब्यूरो

    Women’s Day Special :जब बाजार में चमचमाती शिमला मिर्च, बेदाग सेब और दर्पण-सी चमकती बैंगन दिखती है तो आम उपभोक्ता उन्हें बेहतर मान लेता है। लेकिन एक महिला वैज्ञानिक हैं जो ऐसी सब्जियों को देखकर खुश नहीं, बल्कि चिंतित हो जाती हैं। डॉ. लक्ष्मी रावत, जैव-नियंत्रण वैज्ञानिक, पर्वतीय कृषि महाविद्यालय रानीचौरी, कहती हैं- अगर किसी फल या सब्जी पर एक भी धब्बा नहीं है तो एक वैज्ञानिक के तौर पर मैं सोचती हूं कि उसमें कितने रसायनों का छिड़काव किया गया होगा। डॉ. रावत बताती हैं कि आज की खेती में उपयोग हो रहे कई कीटनाशक सिस्टमैटिक हैं। यानी वे सिर्फ फल या सब्जी की ऊपरी सतह पर नहीं रहते बल्कि पौधे के ऊतकों के भीतर प्रवेश कर जाते हैं। पहले जो दवाएं थीं वे बाहर परत बनाती थीं। बारिश होती तो काफी हद तक धुल जाती थीं।

    अब जो रसायन आ रहे हैं वे सीधे पौधे के अंदर चले जाते हैं। कीड़ा नहीं लगता लेकिन जहर भी बाहर नहीं निकलता। यही कारण है कि बाजार में रखी सब्जियां भले ही आकर्षक दिखें लेकिन उनके भीतर रसायनों का अवशेष (रेजिड्यू) मौजूद रहता है। यह धीरे-धीरे मानव शरीर में जमा होता है और दीर्घकालिक बीमारियों का कारण बन सकता है। रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग के परिणामों की चर्चा करते हुए डॉ. रावत पंजाब का उदाहरण देती हैं। वहां कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग के कारण स्वास्थ्य संकट गहरा चुका है। एक ट्रेन को स्थानीय लोग कैंसर ट्रेन के नाम से पुकारते हैं क्योंकि उसमें सफर करने वाले अनेक यात्री कैंसर उपचार के लिए जाते हैं। वह कहती हैं। ग्रीन रिवोल्यूशन ने हमें उत्पादन दिया लेकिन हमने रसायनों का संतुलन खो दिया।

    उपभोक्ता भी जिम्मेदार
    डॉ. रावत का मानना है कि सिर्फ किसान या कंपनियां ही जिम्मेदार नहीं हैं। उपभोक्ताओं की पसंद भी इस संकट को बढ़ा रही है। हम बाजार में वही सब्जी चुनते हैं जो सबसे ज्यादा चमकदार हो। अगर टमाटर पर हल्का धब्बा है तो हम उसे छोड़ देते हैं। लेकिन प्रकृति में पूर्णता नहीं होती। थोड़ी-बहुत असमानता स्वाभाविक है। वह कहती हैं, हमें सुंदरता के बजाय सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी।
    डॉ. लक्ष्मी रावत पिछले एक दशक से अधिक समय से किसानों और मिट्टी के स्वास्थ्य पर काम कर रही हैं। कृषि विज्ञान केंद्र से लेकर विश्वविद्यालय परिसर तक उन्होंने जमीनी स्तर पर किसानों की समस्याएं देखी हैं। वह कहती हैं, किसान अपनी आय बढ़ाना चाहता है। अगर उसे तुरंत असर दिखेगा तो वह वही अपनाएगा। रसायन तुरंत असर दिखाते हैं जैविक प्रक्रिया समय लेती है। लेकिन, रसायनों के प्रयोग से मिट्टी की जैव विविधता प्रभावित होती है। केंचुए और लाभकारी सूक्ष्मजीव कम होते जाते हैं। धीरे-धीरे मिट्टी बंजर जैसी हो जाती है। ऊपरी तौर पर उपज देती हुई लेकिन भीतर से थकी हुई। वह कहती हैं, जब हम जैविक विकल्प अपनाते हैं तो मिट्टी में फिर से जीवन लौटता है। केंचुए दिखाई देते हैं। मिट्टी की संरचना सुधरती है।

    मिट्टी से निकले, मिट्टी के रक्षक
    डॉ. रावत बताती हैं कि उनकी प्रयोगशाला में तैयार किए जा रहे जैव अभिकर्ता उत्तराखंड की स्थानीय मिट्टी से पृथक किए गए सूक्ष्मजीवों पर आधारित हैं। इनमें ट्राइकोडर्मा, स्यूडोमोनास, एजोटोबैक्टर और बैसिलस जैसे लाभकारी जीव शामिल हैं। हम बाहर से कुछ आयात नहीं कर रहे। ये जीव यहीं की मिट्टी से निकले हैं इसलिए यहां की जलवायु और फसलों के अनुकूल हैं। वह कहती हैं कि ये सूक्ष्मजीव मृदाजनित रोगों जैसे, जड़ गलन, उकठा रोग, पौधशाला में सड़न पर नियंत्रण में कारगर साबित हो रहे हैं। पहाड़ में टमाटर, गोभी, शिमला मिर्च, बैंगन और आलू जैसी सब्जियां किसानों की नकदी फसलें हैं और इन्हीं में ये रोग सबसे अधिक नुकसान पहुंचाते हैं।

    कैसे करते हैं काम?
    रासायनिक कीटनाशक जहां रोगाणु को सीधे मारते हैं वहीं जैव अभिकर्ता प्रतिस्पर्धा, परजीविता और प्रतिरोध क्षमता बढ़ाकर काम करते हैं। वह बताती हैं, इन्हें आप आयुर्वेदिक दवा की तरह समझिए। ये मिट्टी में जाकर हानिकारक फफूंद और जीवाणुओं को दबाते हैं। पौधे की जड़ों की वृद्धि बढ़ाते हैं और पौधे की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करते हैं। इनके प्रयोग से पौधे सूखे या प्रतिकूल परिस्थितियों को भी अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से सहन कर पाते हैं। कई बार किसान उत्पाद तो ले लेते हैं लेकिन सही विधि न अपनाने पर परिणाम नहीं मिलते। इसीलिए डॉ. रावत प्रशिक्षण पर विशेष जोर देती हैं।

    नो प्रॉफिट–नो लॉस
    विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में उत्पाद तैयार कर किसानों को लगभग 100 रुपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराए जा रहे हैं। यह दर लाभ कमाने के लिए नहीं बल्कि पैकेजिंग और न्यूनतम खर्च निकालने के लिए तय की गई है। वह कहती हैं, अगर हम मुफ्त दे देंगे तो लोग उसकी कद्र नहीं करेंगे। थोड़ी-सी कीमत देने से किसान भी गंभीरता से लेता है। रानीचौरी और आसपास के क्षेत्रों के किसान नियमित रूप से रजिस्टर में अपनी मांग दर्ज कराते हैं। हाल ही में उत्तरकाशी से 20–25 किलो जैव उत्पाद की मांग आई। किसान खुशीराम डबराल और देवी प्रसाद चौहान जैसे किसान इसके लाभ का अनुभव कर चुके हैं। उन्हें पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

    प्रयोगशाला से खेत तक की यात्रा
    डॉ. रावत 2012 से इस मुहिम से जुड़ी हैं। कृषि विज्ञान केंद्र में एक वर्ष प्रभारी के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने जमीनी समस्याओं को समझा। बाद में मिलेट्स और सब्जी फसलों पर शोध करते हुए नई प्रजातियों के विकास में योगदान दिया। उनकी प्रयोगशाला केवल शोध का केंद्र नहीं बल्कि किसानों के लिए खुला मंच भी है। यहां छात्र प्रशिक्षण लेते हैं, किसान सलाह लेने आते हैं और वैज्ञानिकों के साथ सीधा संवाद संभव है।

    बाजार में जैविक हिस्सेदारी क्यों कम?
    देश के कुल कृषि बाजार में जैविक उत्पादों की हिस्सेदारी अभी भी बेहद कम करीब 1 से 2 प्रतिशत बताई जाती है। इसके पीछे कई कारण हैं। रसायनों में अधिक मुनाफा होता है। परिणाम भी तुरंत मिल जाता है। जबकि, जैविक उत्पादों में समय लगता है। डॉ. रावत कहती हैं, जब तक वैज्ञानिक, किसान और सरकारी विभाग एक साथ काम नहीं करेंगे तब तक बदलाव अधूरा रहेगा।
    सिर्फ उत्पाद बना देने से क्रांति नहीं आती। उसके पीछे पूरी व्यवस्था खड़ी होनी चाहिए। किसान लाभ भी देख रहे हैं। फिर भी देश के कुल कृषि बाजार में जैविक उत्पादों की हिस्सेदारी महज 1–2 प्रतिशत के आसपास सिमटी हुई है। आखिर क्यों? डॉ. रावत कारण गिनाती हैं-

    पहली बाधा : महंगा रजिस्ट्रेशन
    एक जैव उत्पाद को औपचारिक रूप से पंजीकृत (रजिस्टर) कराने में 20–25 लाख रुपये तक का खर्च आता है। हम विश्वविद्यालय स्तर पर शोध करते हैं। हमारे पास इतने बड़े फंड नहीं होते कि हर उत्पाद का व्यावसायिक रजिस्ट्रेशन करा सकें। यही वजह है कि कई शोध प्रयोगशाला तक सीमित रह जाते हैं।

    दूसरी बाधा: लॉजिस्टिक्स और तापमान

    जैव उत्पादों की शेल्फ लाइफ सामान्यतः 6 से 9 महीने होती है। यह भी तभी, जब इन्हें उचित तापमान और भंडारण में रखा जाए। अगर किसी ने दक्षिण भारत से उत्पाद मंगाया और बिना तापमान नियंत्रण के ट्रक से भेज दिया तो रास्ते में ही सूक्ष्मजीव मर सकते हैं। जब किसान ऐसे निष्क्रिय उत्पाद का प्रयोग करता है और परिणाम नहीं मिलता, तो उसका विश्वास टूट जाता है।

    तीसरी बाधा: बाजार का गणित

    रसायनों के बाजार में डीलरों और कंपनियों का मुनाफा अधिक है। जैव उत्पादों में लाभांश अपेक्षाकृत कम। रसायन बेचने में त्वरित परिणाम और मुनाफा दोनों हैं। जैविक उत्पाद में धैर्य चाहिए। इसी कारण बाजार में आक्रामक प्रचार रसायनों का होता है जबकि जैव विकल्पों की जानकारी सीमित रह जाती है।

    चौथी बाधा: प्रशिक्षण का अभाव
    वैज्ञानिक, किसान और लाइन डिपार्टमेंट। तीनों को एक साथ काम करना होगा। किसान सीधे विभाग से जुड़ता है। हमसे उसे ज्ञान मिलता है। अगर समन्वय नहीं होगा तो योजना अधूरी रहेगी। कई बार गलत या अप्रमाणित सलाह किसानों को नुकसान पहुंचाती है। किसी ने कह दिया इसमें गुड़ मिला दो, किसी ने कुछ और बता दिया। ऐसे प्रयोग नुकसानदेह हो सकते हैं।

    पहाड़ की विशेष चुनौती

    उत्तराखंड जैसे राज्य में भौगोलिक परिस्थितियां भी चुनौती हैं। दो कृषि विश्वविद्यालय पूरे प्रदेश को कवर नहीं कर सकते। स्थानीय स्तर पर उत्पादन इकाइयों की कमी है। उदाहरण के तौर पर पहाड़ों में मशरूम के लिए कंपोस्ट निर्माण की स्थानीय इकाइयां बेहद कम हैं। नीचे से लाने पर परिवहन लागत और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होते हैं।

    • समाधान क्या है?
    • बदलाव के लिए बहुस्तरीय प्रयास जरूरी है।
    • स्थानीय स्तर पर जैव उत्पाद निर्माण इकाइयां
    • रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में आर्थिक सहायता
    • वैज्ञानिक-किसान-विभाग समन्वय
    • नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम
    • उपभोक्ताओं में जागरूकता

    पहाड़ लौटने की चाह

    डॉ. रावत का बचपन सेना परिवार में बीता। केशर सिंह रावत, भारतीय सेना की कुमाऊं रेजिमेंट से मानद कैप्टन के पद से सेवानिवृत्त हैं। माता पुष्पा रावत एक कुशल गृहिणी हैं। पिता भारतीय सेना में थे इसलिए शिक्षा अलग-अलग शहरों में हुई। लेकिन उनके मन में किसानों के लिए कुछ करने का जज्बा था। अपने करियर के शुरुआती दिनों में उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र में प्रभारी के रूप में कार्य किया। वहां एक वर्ष तक उन्होंने सीधे किसानों के बीच रहकर उनकी समस्याएं समझीं। वह कहती हैं कि किसान की सबसे बड़ी चिंता आय है। अगर उसकी फसल रोग से बच जाए और लागत कम हो तो वही उसकी असली राहत है। यहीं से उनके मन में यह स्पष्ट हुआ कि प्रयोगशाला और खेत के बीच की दूरी कम करनी होगी।

    शोध और नई प्रजातियों का विकास
    उन्होंने मिलेट्स (मोटा अनाज) पर लगभग एक दशक तक काम किया। पहाड़ की जलवायु के अनुरूप फसलों की उत्पादकता और गुणवत्ता बढ़ाने पर शोध किया। राई और मूली की प्रजातियों को विश्वविद्यालय परिसर से रिलीज कराया गया। किसी भी फसल की प्रजाति रिलीज होना एक लंबी वैज्ञानिक प्रक्रिया का परिणाम होता है। कई वर्षों के परीक्षण, मूल्यांकन और सत्यापन के बाद ही यह संभव होता है। जब प्रजाति रिलीज होती है तभी वह बीज शृंखला में जाती है और किसान तक पहुंचती है।

    सेब के पेड़ पर 10 से 15 बार कीटनाशक का छिड़काव

    डॉ. लक्ष्मी रावत कहती हैं, सेब की फसल में फूल आने से लेकर फल तोड़ने तक कई चरणों में कीटनाशकों और फफूंदनाशकों का छिड़काव किया जाता है। पहाड़ी इलाकों में सेब पर स्कैब, कीट और फफूंद का खतरा अधिक रहता है इसलिए एक सीजन में 10 से 15 बार तक स्प्रे होना असामान्य नहीं है। वे बताती हैं कि इनमें से कई रसायन ‘सिस्टमैटिक’ होते हैं, जो केवल छिलके पर नहीं रहते बल्कि पौधे के भीतर प्रवेश कर फल तक पहुंच जाते हैं। यही वजह है कि बाहर से चमकदार और बेदाग दिखने वाला सेब भीतर रासायनिक अवशेष समेटे हो सकता है। हालांकि, वे यह भी स्पष्ट करती हैं कि किसान मजबूरी में ऐसा करते हैं। यदि समय पर दवा न डाली जाए तो पूरी फसल स्कैब या कीटों से खराब हो सकती है और लाखों का नुकसान हो सकता है। वह कहती हैं, मुद्दा किसान को दोष देना नहीं बल्कि सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प विकसित करना है।

     

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