भारतीय सेना ने एक ऐतिहासिक प्रशासनिक निर्णय लेते हुए लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित को ब्रिगेडियर पद पर पदोन्नत करने की आधिकारिक स्वीकृति दे दी है। यह फैसला उनके करियर से जुड़े लगभग दो दशक पुराने कानूनी विवाद और हाल ही में मिली अदालती राहत के बाद आया है। आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के हस्तक्षेप और जुलाई 2025 में विशेष एनआईए अदालत द्वारा मालेगांव विस्फोट मामले में उन्हें पूरी तरह बरी किए जाने के बाद, सेना ने उनकी पदोन्नति की बाधाओं को दूर कर दिया है।
कर्नल पुरोहित का सैन्य करियर साल 2008 में उस समय रुक गया था जब उन्हें मालेगांव धमाकों के मामले में आरोपी बनाया गया था। इसके कारण उन्हें अपनी सेवा का एक बड़ा हिस्सा यानी वर्ष 2008 से 2017 तक का समय जेल में बिताना पड़ा। साल 2017 में देश की सर्वोच्च अदालत से जमानत मिलने के बाद उन्होंने पुनः सेना में वापसी की लेकिन कर्नल से ब्रिगेडियर पद की उनकी पदोन्नति कानूनी प्रक्रिया लंबित होने के कारण रुकी हुई थी। उनकी सेवानिवृत्ति 31 मार्च 2026 को तय थी, जिस पर एएफटी ने रोक लगाते हुए उनकी पदोन्नति की याचिका पर सुनवाई की और अंततः उन्हें वरिष्ठ रैंक देने का मार्ग प्रशस्त किया।

सेना के रिकॉर्ड के अनुसार, श्रीकांत पुरोहित मिलिट्री इंटेलिजेंस के एक अनुभवी अधिकारी रहे हैं, जिन्होंने विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्हें अपनी यूनिट में एक मेहनती और भाषाओं के जानकार अधिकारी के रूप में देखा जाता रहा है। लंबे समय तक चले इस कानूनी संघर्ष के दौरान कर्नल पुरोहित ने निरंतर तर्क दिया था कि उनकी गिरफ्तारी और लंबी न्यायिक जांच ने उनके करियर की स्वाभाविक प्रगति को बाधित किया है। उनकी दोषमुक्ति के बाद अब उनकी पदोन्नति को उनके सेवा रिकॉर्ड और वैधानिक अधिकारों की बहाली के रूप में देखा जा रहा है। यह पदोन्नति न केवल उन्हें नया रैंक प्रदान करेगी, बल्कि उनके सेवा लाभों और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली सुविधाओं पर भी सकारात्मक प्रभाव डालेगी। ट्रिब्यूनल के निर्देशानुसार, उनकी वैधानिक शिकायतों का निपटारा होने तक उनकी सेवा जारी रखने का निर्णय लिया गया है, ताकि वे ब्रिगेडियर के रूप में अपनी सेवाएं दे सकें। कर्नल पुरोहित का यह मामला भारतीय सैन्य इतिहास में एक विरल उदाहरण बन गया है, जहां एक अधिकारी ने लगभग नौ साल जेल में बिताने और गंभीर आरोपों का सामना करने के बाद न केवल वर्दी दोबारा पहनी, बल्कि अपनी योग्यता और न्यायिक जीत के आधार पर उच्च पद भी प्राप्त किया।










