- अतुल्य उत्तराखंड के लिए विकास जोशी
नेपाल में साल 2024 में उभरा युवा आंदोलन पारंपरिक राजनीति के खिलाफ असंतोष को खुलकर सामने लाया। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता से परेशान युवाओं ने एक वैकल्पिक नेतृत्व की तलाश शुरू की और इसी खाली जगह को बालेन शाह ने भरा। नेपाल में उनका उभार सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि राजनीतिक माइंडसेट का बदलाव है, जहां विचारधारा से ज्यादा परिणामों की अपेक्षा है। शाह की राजनीति का मूल-मंत्र साफ है, तेज फैसले, सीधा असर। प्रधानमंत्री पद संभालते ही बालेन शाह ने साफ कर दिया है कि उनका कार्यकाल पारंपरिक राजनीति की तरह धीमा नहीं होगा। शुरुआती फैसलों से ही संकेत मिल रहा है कि वे कम समय में नेपाल की व्यवस्था में बड़े बदलाव लाने के मूड में हैं।
सबसे पहले उन्होंने शिक्षा क्षेत्र को निशाने पर लिया। स्कूलों और विश्वविद्यालयों में सक्रिय राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठनों पर रोक लगा दी गई है। इन संगठनों को 60 दिनों के भीतर अपने दफ्तर और ढांचे हटाने का निर्देश दिया गया है। उनकी जगह गैर-राजनीतिक स्टूडेंट काउंसिल सिस्टम विकसित करने की योजना है, जिससे शिक्षा संस्थानों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त किया जा सके। इसी के साथ शाह ने ‘परीक्षा मुक्त बचपन’ की अवधारणा लागू करते हुए कक्षा 5 तक पारंपरिक परीक्षाओं को समाप्त कर दिया है। इसके स्थान पर वैकल्पिक मूल्यांकन प्रणाली लागू की जा रही है, जिसका उद्देश्य बच्चों पर पढ़ाई का दबाव कम करना और उनके समग्र विकास को बढ़ावा देना है।

राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने के उद्देश्य से सरकार ने एक और अहम फैसला लिया है। ऑक्सफोर्ड और सेंट जेवियर्स जैसे विदेशी नाम वाले शैक्षणिक संस्थानों को इसी वर्ष अपने नाम बदलकर नेपाली पहचान के अनुरूप करने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं, निजी शिक्षा संस्थानों पर भी सरकार का रुख सख्त नजर आ रहा है। बालेन शाह सरकारी स्कूलों को मजबूत करने के पक्षधर हैं और प्राइवेट स्कूलों की निर्भरता को कम करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।
ओली की गिरफ्तारी: सियासत या कूटनीतिक संकेत?
बालेन शाह का पहला बड़ा और विवादास्पद फैसला रहा—पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की गिरफ्तारी। यह वही ओली हैं, जिनके खिलाफ शाह ने चुनाव लड़ा और 50 हजार से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। ओली की गिरफ्तारी को सिर्फ एक राजनीतिक कार्रवाई के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसके पीछे गहरे कूटनीतिक संकेत भी तलाशे जा रहे हैं। ओली को लंबे समय से चीन समर्थक नेता माना जाता रहा है और उनके कार्यकाल में नेपाल का झुकाव बीजिंग की ओर स्पष्ट दिखा था। ऐसे में शाह का यह कदम चीन के लिए एक सख्त संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है। ओली के खिलाफ कार्रवाई से बालेन शाह एक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि नई सरकार सत्ता के पुराने सेटअप को तोड़ने में नहीं हिचकेगी।
दूसरी ओर, यह अटकलें भी तेज हैं कि शाह का रुख भारत के प्रति अपेक्षाकृत सकारात्मक हो सकता है। हालांकि, इस निष्कर्ष पर पहुंचना फिलहाल जल्दबाजी होगी। इसकी वजह यह है कि बालेन शाह खुद को नेपाल की प्रखर राष्ट्रवादी राजनीति का प्रतिनिधि मानते हैं और नेपाल की यह राष्ट्रवादी धारा अक्सर भारत के प्रति आलोचनात्मक रुख अपनाती रही है। यही कारण है कि सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम है, क्या बालेन शाह के नेतृत्व में भारत-नेपाल संबंध नई मजबूती की ओर बढ़ेंगे, या फिर राष्ट्रवाद की राजनीति उन्हें एक बार फिर तनाव की दिशा में ले जाएगी?
रोटी-बेटी से रणनीति तक: भारत-नेपाल रिश्तों की असली तस्वीर
भारत और नेपाल के संबंध सिर्फ पड़ोसी देशों के रिश्ते नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक जुड़ाव की मिसाल हैं। ‘रोटी-बेटी’ का रिश्ता यहां महज कहावत नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत है, जहां सीमाएं कागज पर हैं, लेकिन जीवन आपस में गहराई से जुड़ा हुआ है। हिमालय से उतरती नदियां और तराई के साझा मैदान इन दोनों देशों को भौगोलिक रूप से एक-दूसरे में पिरोते हैं। यही कारण है कि दोनों के बीच खुली सीमा है, नेपाल के नागरिक भारत में न केवल काम कर सकते हैं, बल्कि संपत्ति रखने का अधिकार भी रखते हैं। शिक्षा और अवसरों के लिहाज से भी भारत, नेपाल के युवाओं और नेताओं के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। धार्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर यह रिश्ता और गहरा हो जाता है, पशुपतिनाथ मंदिर से काशी विश्वनाथ मंदिर और लुंबिनी से बोधगया तक फैली आस्था की यह धारा राजनीतिक सीमाओं को भी पार कर जाती है।
आर्थिक दृष्टि से भी भारत, नेपाल का सबसे बड़ा साझेदार है। नेपाल का अधिकांश विदेशी व्यापार भारतीय बंदरगाहों और ट्रांजिट मार्गों के जरिए संचालित होता है। अब इस रिश्ते में एक नया आयाम जुड़ चुका है, ऊर्जा कूटनीति। नेपाल से भारत को 10,000 मेगावाट बिजली निर्यात करने का दीर्घकालिक समझौता दोनों देशों के संबंधों को एक नई दिशा दे रहा है। हालांकि, इन गहरे रिश्तों के बीच चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा जैसे सीमा विवाद लंबे समय से दोनों देशों के बीच तनाव का कारण रहे हैं। बालेन शाह अतीत में इन मुद्दों पर काफी मुखर रहे हैं और उस विचारधारा के समर्थक माने जाते हैं, जो इन क्षेत्रों को नेपाल का हिस्सा मानती है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या सत्ता में आने के बाद शाह का रुख बदलेगा, या राष्ट्रवाद की वही धार भारत-नेपाल संबंधों को नए तनाव की ओर ले जाएगी? फिलहाल जवाब वक्त के पास है, और आने वाले दिनों में शाह के फैसले ही इस रिश्ते की नई दिशा तय करेंगे।

शाह के राष्ट्रवाद की धार: भारत के लिए चुनौती या अवसर?
युवा बालेन शाह नेपाल की प्रखर राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रतिनिधि माने जाते हैं। काठमांडू के मेयर रहते हुए उन्होंने लगातार ऐसे मुद्दों को उठाया, जो सीधे जनता की भावनाओं से जुड़े थे। यही वजह है कि उनका राष्ट्रवाद सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक अपील भी रखता है। मेयर कार्यकाल के दौरान शाह कई बार भारत-आलोचनात्मक रुख अपनाते दिखे। ‘ग्रेटर नेपाल’ की अवधारणा का समर्थन और अपने कार्यालय में उसका नक्शा लगाना उनकी वैचारिक स्थिति को स्पष्ट करता है। इसी क्रम में फिल्म आदिपुरुष के प्रदर्शन पर रोक लगाने का उनका फैसला भी चर्चा में रहा, जहां माता सीता की उत्पत्ति को लेकर सांस्कृतिक असहमति सामने आई। यही राष्ट्रवादी तेवर भारत-नेपाल संबंधों में संभावित तनाव का आधार भी बन सकता है खासकर तब, जब सीमा विवाद पहले से ही मौजूद हैं।
भारत के साथ रिश्ते: विरोध नहीं, ‘नेपाल फर्स्ट’?
हालांकि, बालेन शाह की राजनीति को सिर्फ ‘भारत विरोध’ के चश्मे से देखना अधूरा विश्लेषण होगा। गहराई से देखने पर यह रुख ‘नेपाल फर्स्ट’ की नीति ज्यादा प्रतीत होता है। जहां राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है, भले ही उसके लिए कड़े फैसले क्यों न लेने पड़ें। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शाह और पार्टी अध्यक्ष रवि लछिमाने को फोन कर बधाई दी और द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई देने की बात कही। लेकिन असली सवाल यही है, क्या यह कूटनीतिक शिष्टाचार जमीन पर ठोस सहयोग में बदलेगा? विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल किसी स्पष्ट निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

सीमा विवाद: फिर उभर सकता है तनाव
शाह के नेतृत्व में कालापानी, लिपुलेख और सुस्ता जैसे विवादित मुद्दे फिर से केंद्र में आ सकते हैं। अतीत में नेपाल की सरकारें ‘चीन कार्ड’ खेलकर भारत पर दबाव बनाती रही हैं। हालांकि, बालेन शाह के रुख में चीन को लेकर सतर्कता भी दिखती है। उन्होंने संकेत दिया है कि नेपाल किसी भी ‘कर्ज-जाल’ में फंसने से बचेगा। इसका मतलब यह नहीं कि नेपाल पूरी तरह भारत के पक्ष में झुक जाएगा, बल्कि यह एक संतुलित विदेश नीति की ओर इशारा करता है। एक व्यवहारिक नेता के तौर पर शाह दोनों भारत और चीन के साथ रिश्ते बनाए रखने की कोशिश करेंगे। ऐसे में भारत के लिए चुनौती साफ है नेपाल में अपनी परियोजनाओं और साझेदारी की गति को प्रतिस्पर्धी बनाए रखना।
अनुभव बनाम ऊर्जा: क्या भारी पड़ेगा?
बालेन शाह की सबसे बड़ी ताकत उनकी युवा ऊर्जा और जनसमर्थन है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल उनका अनुभव है। मेयर से सीधे प्रधानमंत्री बनने का सफर जितना तेज है, उतनी ही जटिल जिम्मेदारियां भी साथ लाता है। इंजीनियर बैकग्राउंड से आने वाले शाह पारंपरिक विचारधाराओं के बजाय रिजल्ट-ओरिएंटेड पॉलिटिक्स की ओर झुकाव रखते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि वे कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक सुधारों पर ज्यादा फोकस कर सकते हैं। भारत के लिए यह एक अवसर भी है, पुरानी राजनीतिक धारणाओं से हटकर एक नए, आधुनिक नेतृत्व के साथ सीधे संवाद का।

रैपर से प्रधानमंत्री तक का सफर
2010 के दशक में रैपर से पहचान
बालेन शाह ने एक रैपर और यूथ आइकन के रूप में अपनी पहचान बनाई। उनके गानों में सिस्टम, भ्रष्टाचार और युवाओं के मुद्दे प्रमुख रहे—यहीं से उनकी ‘एंटी-एस्टैब्लिशमेंट’ छवि उभरी।
2022 – काठमांडू के मेयर बने
स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़कर बालेन शाह काठमांडू के मेयर बने। यह जीत पारंपरिक पार्टियों के खिलाफ जनता के बदल रहे मूड का पहला बड़ा संकेत थी।
2024 (मई–जून) – GEN-Z आंदोलन का उभार
नेपाल में युवाओं ने पारंपरिक राजनीति के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई। बालेन शाह इस आंदोलन का चेहरा बनकर उभरे, यहां से नेपाल में ‘नई राजनीति’ की मांग तेज हुई।
2024–25 – राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) का गठन
युवाओं के लिए वैकल्पिक राजनीति के एजेंडे के साथ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का गठन हुआ। पारंपरिक दलों के विकल्प के तौर पर आरएसपी तेजी से उभरी।
2026 चुनाव – बंपर जीत, सियासत पलटी
आरएसपी को बहुमत के करीब सीटें मिलीं। बालेन शाह ने पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली को भारी अंतर से हराया।
2026 – पीएम पद तक पहुंचे बालेन
GEN-Z लहर, एंटी-एस्टैब्लिशमेंट इमेज और मजबूत जनसमर्थन के दम पर बालेन शाह सीधे देश की सत्ता तक पहुंच गए। 27 मार्च को उन्होंने देश के सबसे युवा पीएम के तौर पर शपथ ली।
नेपाल का ऐतिहासिक मोड़
नेपाल का यह चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। 2008 के बाद पहली बार किसी पार्टी ने स्पष्ट बहुमत के करीब प्रदर्शन किया। 2015 के संविधान के बाद यह धारणा बन गई थी कि कोई भी पार्टी अकेले सरकार नहीं बना पाएगी, लेकिन यह मिथक टूट गया। बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही पारंपरिक पार्टियों का प्रभाव घटा और युवा नेतृत्व का उदय हुआ। नेपाल की राजनीति में ‘फेस-ड्रिवन’ ट्रेंड मजबूत हुआ।
भारत के लिए ‘पॉजिटिव अनिश्चितता’
बालेन शाह का नेतृत्व भारत के लिए एक ‘पॉजिटिव अनिश्चितता’ लेकर आया है। एक तरफ प्रखर राष्ट्रवाद की चुनौती है, तो दूसरी तरफ एक आधुनिक, परिणाम-आधारित नेतृत्व का अवसर। कुल मिलाकर, नेपाल की यह GEN-Z सरकार पारंपरिक ढांचे से हटकर फैसले ले रही है। ऐसे में यह तय है कि आने वाले समय में भारत-नेपाल संबंध या तो नई ऊंचाई छुएंगे या फिर नए तनाव के दौर में प्रवेश करेंगे।










