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    Uttarakhand : एक खेत…प्रसाद के रूप में बंटती है जिसकी घास

    बात उस खेत की करते हैं, जो गांव की सरहद में है। सेरे के बीच में होते हुए भी इस खेत में गेहूं, नाज (धान), मंडुवा-झंगोरा,चीणा-कौंणी की फसलें नहीं लहलहातीं हैं बल्कि श्रद्धा-भक्ति, आस्था-विश्वास का ऐसा अलौकिक अहसास करवाता है। तभी तो इस खेत की माटी मोती बन मस्तक की आभा बढ़ाती है। यह दिव्य खेत कहीं और नहीं बल्कि देवभूमि उत्तराखंड के सीमांत उत्तरकाशी के पश्चिमोत्तर रवांई क्षेत्र की बनाल पट्टी के कोटी गांव में है, जिसे लोग देऊडोखरी (देवडोखरी) के नाम से जानते-मानते, पूजते-बांदते हैं।
    teerandajBy teerandajDecember 20, 2024Updated:December 20, 2024No Comments
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    • अतुल्य उत्तराखंड के लिए दिनेश रावत

    एक खेत! हर वर्ष पहली बार जब भी वहां घास कटती है, गांव के लोगों में प्रसाद के रूप में बंटती है। जी हां! यह सच है। वहां उत्सव-सा माहौल दिखता है। आस्था दिखती है, उल्लास दिखता है। गीत-प्रीत और संगीत दिखता है। सामूहिकता का भाव दिखता है, अपनी जड़—ज़मीन से जुड़ाव दिखता है। इसलिए उस खेत से घास लेने के लिए गांव के हर घर-परिवार से कोई-न-कोई सदस्य अवश्य पहुंचता है। उस दिव्य भूमि को प्रणाम करते हैं। पूजते हैं, धूप-दीप, गंध—अक्षत और भोग-प्रसाद चढ़ाते हैं।

    इसी बहाने आराध्य इष्टदेव श्रीरघुनाथ जी का पूजन-वंदन, अर्चन-स्मरण करते हैं। धूप-पिठाईं (रोली-चंदन), पत्र-पुष्प, मीठा रोट (गुड़ मिली घी के साथ बनी रोटी जो सामान्य रोटी से कुछ अधिक मोटी व बड़ी होती है) चढ़ाते हैं। छीमू-टीखू करके लोक पूजित-प्रतिष्ठित देवी-देवताओं को मनाते हैं। अपने घर—परिवार, पशु—मवेशियों की खुशहाली की कामना के साथ आशीर्वाद मांगते हैं और फिर अपार हर्ष—उल्लास, उमंग-उत्साह व आस्था-विश्वास के साथ दाथरी (दरांती) पकड़कर घास काटने लग जाता है लेकिन पूजन-अर्चन की यह प्रक्रिया तब तक आरंभ नहीं होती जब तक गांव के हर परिवार से कोई-न-कोई सदस्य पहुंच नहीं जाता है।

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    सबके पहुंचते ही सामूहिक पूजन-वंदन होता है और तब शुरू होती है घास कटाई का उत्सव। घास काटते हुए लोग बेहद आनंदित-उत्साहित नज़र आते हैं। वे सभी आपस में खूब बतियाते हैं। दादी—परदादी के जमाने के किस्से—कहानियां सुनाते हैं। कभी हंसी—मजाक तो कभी इष्टदेव की महिमा तथा इस दिव्यभूमि के घास के महात्म्य से जुड़ी रोचक कथाएं सुनाते जाते है और घास के फूले (बंडल) बांधते रहते हैं। बोझा बनाते हैं लेकिन उसे पीठ पर उठाने से पहले उस पावन भूमि और भूमि से उपजी दिव्य शक्ति के प्रति अपनी कृतज्ञता अभिव्यक्त करना नहीं भूलते हैं जिसके नाम से पीढ़ियों से सुरक्षित-संरक्षित है यह खेत। इसलिए गीत की तांद में जुट जाते हैं।

    देवता की हारूल (लोक गीत की एक विधा) गाते (लगाते) हैं और काम के नाम पर जमकर उत्सव मनाते हैं। हंसते-मुस्कुराते, गाते-गुनगुनाते, नाचते-खेलते हुए गीतों की श्रृंखला इस कदर वेगवान हो जाती है कि आस्था से शुरु होकर आनंद-अनुरंजन तक जा पहुंचती हैं। यही इस लोक की खासियत भी है कि यहां हर अवसर पर उत्सव-सा माहौल नज़र आता है, जो लोक वासियों की उत्सवधर्मिता को दर्शाते हैं। फिर चाहे बात खेतों में रोपणी—बिजाड़ (रोपाई) से जुड़ें कामों की हो या जंगल में चारा—पत्ती लेने गयी महिला टोलियों की, वे सभी जब एकस्वर होकर गाती हैं तो दिशाएं भी स्पंदित हुए बिना नहीं रह पातीं हैं। उत्सवधर्मिता ही तो है कि यहां जीवन ही ज्योर्तिमय नहीं बल्कि मृत्यु भी महोत्सव बन जाता है।

    लोक मान्यता है कि सदियों पूर्व इसी खेत में हल जोतते हुए हमारे पुरखों को एक पाषाणिक मूर्ति प्राप्त हुई थी। लोकवासी उस दिव्य प्रतिमा के दैवीय चमत्कारों को देख ऐसे चमत्कृत हुए कि सदा—सदा के लिए उसी के शरणागत हो गए। वही दिव्य शक्ति इस पूरे क्षेत्र के अतिरिक्त पुरोला की रामा और कमल सेरांई पट्टियों में भी आराध्य इष्टदेव के रूप श्री रघुनाथ जी के नाम से पूजित-प्रतिष्ठित है। रघुनाथ जी के इस क्षेत्र में गैर व पुजेली में दो दिव्य-भव्य मंदिर हैं जहां वे क्रमशः छह-छह माह के विराजते हैं। इस अवधि में लोक परंपरानुसार वहीं उनकी नियमित पूजा—अर्चना होती है। इस खेत में जब से मूर्ति उपजी गांववालों द्वारा उसी समय यह खेत उस दिव्य शक्ति को ही समर्पित कर दिया गया है और इनका नाम भी देऊडोखरी (देवडोखरी) जिसका शाब्दिक अर्थ इस प्रकार हुआ— देऊ/देव अर्थात् देवता और डोखरी यानी खेत अथवा देवता का खेत। इसलिए इस खेत में न कोई फसलें बोता-काटता है, ना अपना एकाधिकार जमाता है। यह देवता की भूमि है और देव कार्यों के लिए ही उपयोग में लायी जाती है।

    यह भी उल्लेखनीय है कि बड़कोट, पुरोला और मोरी तहसीलों, यमुना और टौंस (तमसा) दो नदी घाटी तथा लगभग दो दर्जन पट्टियों एवं 365 गांवों के इस पूरे रवांई क्षेत्र में आज भले ही गांव-गांव में रामलीला, कृष्ण लीला, अभिमन्यु आदि नाटकों का मंचन हो रहा हो लेकिन इस श्रेणी में शामिल रामलीला की शुरुआत भी विक्रम संवत् 2012 के मंगसीर (मार्गशीर्ष) माह में देवडोखरी से हुई।

    श्री रघुनाथ जी भी सोने-चांदी के (झामंण-छतर)आभूषणों से सुशोभित एवं नाना प्रकार की पुष्प मालाओं से सजी-धजी पालकी में सवार होकर पूजा-अनुष्ठान, तीर्थ यात्रा तथा ग्राम भ्रमण के बहाने जब पूरे लाव-लश्कर के साथ मंदिर के गर्भगृह से बाहर निकलते हैं तो सबसे पहले जमणाई लगाने देवडोखरी ही जाती हैं। वहां उनकी पालकी खेत की प्रदक्षिणा करती है और फिर मध्य में आकर झूलती है। जमणाई और देव पालकी का झूलना लोकास्था एवं परंपराओं का एक अभिन्न और महत्वपूर्ण आयाम रहा है।

    अब बात घास की कि जाए तो उसे कटान के लिए वर्ष का एक दिन तय है और वह दिन है— भादौं थौलु की बेठनव/बेठनळ। यह भी उल्लेखनीय है कि क्षेत्र में होने वाले मेले—थौलों में मुख्य मेले के अगले दिन लोकवासी बेठनव/बेठनळ के रूप में मनाते हैं। इसी क्रम में भाद्रपद मास में इष्टदेव के गैर मंदिर में होने वाले भादों थौलु’ के अगले दिन यानी ‘बेठनऊ/बेठनळ’ के दिन कोटी गांव के लोग पूजा-प्रसाद संबंधी सामग्री एवं दाथरी—पागेठू (दरांती—रस्सी) उठाकर देवडोखरी में घास ही नहीं काटते हैं बल्कि प्रकृति व संस्कृति को समर्पित अपनी महान प्रथा—परंपराओं का उत्सव मनाते हैं।

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