केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि कल्याण पत्रिका किसी वैचारिक आंदोलन की उपज नहीं बल्कि भारत की आत्मा और सनातन संस्कृति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सनातन धर्म की रक्षा न तो नारेबाजी से होती है और न ही टकराव से बल्कि शास्त्र तर्क और ज्ञान के आधार पर होती है और कल्याण ने यही कार्य शताब्दी भर किया है। ऋषिकेश में स्वर्गाश्रम स्थित गीता भवन में कल्याण पत्रिका के शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा कि जब देश वैचारिक भ्रम, सांस्कृतिक विघटन और इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किए जाने के दौर से गुजर रहा था, तब कल्याण ने भारतीय समाज को अपनी जड़ों से जोड़े रखा। उन्होंने कहा कि गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित कल्याण ने सनातन धर्म को केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं रखा बल्कि उसे जीवन-दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। इसके माध्यम से धर्म, संस्कृति, राष्ट्र और समाज के बीच संतुलन स्थापित किया गया।
गृह मंत्री ने कहा कि सनातन परंपरा को समय-समय पर रूढ़िवाद, पिछड़ेपन और अंधविश्वास के रूप में चित्रित करने के प्रयास हुए, लेकिन कल्याण ने शास्त्रों के प्रमाण, विद्वानों के लेख और तर्कपूर्ण विवेचन से इन आरोपों का उत्तर दिया। यही कारण है कि यह पत्रिका किसी कालखंड की नहीं, बल्कि हर युग की आवश्यकता बन गई। अमित शाह ने कहा कि कल्याण पत्रिका ने भारतीय संस्कृति के मूल तत्व धर्म, कर्तव्य, संयम, सहिष्णुता और राष्ट्रभाव—को पीढ़ी दर पीढ़ी पहुंचाया। यह कार्य किसी प्रचार या लाभ के उद्देश्य से नहीं, बल्कि सेवा और साधना की भावना से किया गया।

समारोह में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि गीता प्रेस और कल्याण ने उस समय सनातन चेतना को सुरक्षित रखा, जब उस पर संगठित वैचारिक हमले हो रहे थे। उन्होंने कहा कि यह पत्रिका भारत की सांस्कृतिक सुरक्षा की मूक प्रहरी रही है। कार्यक्रम में गीता प्रेस प्रबंधन की ओर से जानकारी दी गई कि कल्याण पत्रिका के अब तक 17 करोड़ 50 लाख से अधिक अंक प्रकाशित हो चुके हैं। यह न केवल इसकी लोकप्रियता बल्कि समाज के विश्वास और वैचारिक स्वीकार्यता का भी प्रमाण है। वक्ताओं ने कहा कि डिजिटल युग में सूचना की अधिकता के बावजूद कल्याण जैसे गंभीर, शोधपरक और मूल्य-आधारित प्रकाशनों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। ऐसे प्रकाशन समाज को केवल सूचना नहीं, दिशा भी देते हैं। समारोह के अंत में अमित शाह ने गीता प्रेस से जुड़े संपादकों, लेखकों और कर्मचारियों के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि कल्याण पत्रिका आने वाले समय में भी भारत की सांस्कृतिक चेतना को सुरक्षित रखने का कार्य करती रहेगी।








