International Women’s Day Special: उत्तराखंड की भौगोलिक विषमताएं जितनी कठोर हैं, यहां की महिलाओं का जीवट और संकल्प उतना ही विशाल है। आज जब हम 2026 में राज्य के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य को देखते हैं तो ये बदलाव साफ नज़र आता है। समाज में हो रहे परिवर्तन को समझने के लिए दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। उत्तराखंड की महिलाएं केवल भागीदारी नहीं कर रहीं बल्कि हर क्षेत्र में नेतृत्व कर रही हैं। ये परिवर्तन अचानक नहीं आया, यह एक-दो वर्षों की उपलब्धि नहीं है न ही केवल किसी सरकारी नीति का परिणाम। यह बदलाव समाज की चेतना, सोच और निरंतर संघर्ष का प्रतीक है। इस बदलाव की असली ताकत और सारथी स्वयं समाज ही रहा है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर ‘अतुल्य उत्तराखंड’ ने प्रदेश भर में सरकारी, गैर-सरकारी क्षेत्र से लेकर स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं और महिला उद्यमियों से बात की। उनके कामों का गहराई से विश्लेषण किया। एक बात स्पष्ट दिखी। परिवर्तन अब अपवाद नहीं प्रवृत्ति बन चुका है। यह बदलाव केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों की कहानी नहीं बल्कि सामाजिक संरचना में हो रहे गहरे परिवर्तन का प्रमाण है। कैदियों के पुनर्वास का कार्य कर रहीं गिरिबाला जुयाल की कहानी बताती है कि महिला नेतृत्व केवल आर्थिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि सामाजिक सुधार और संवेदनशील क्षेत्रों में भी निर्णायक भूमिका निभा रहा है। निरंतर 21 वर्षों से दुर्गम प्राथमिक विद्यालय में डटी रहकर शिक्षा की लौ जलाए रखना, जहां अधिकांश शिक्षक टिकना नहीं चाहते अपने आप में असाधारण प्रतिबद्धता का उदाहरण है। शिक्षिका मंजूबाला का समर्पण केवल व्यक्तिगत धैर्य की कहानी नहीं, बल्कि उस अदृश्य संघर्ष का प्रतीक है जो दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षा के प्रयासों को जीवित रखता है। दूसरी ओर, लाखों के टर्नओवर वाली इंटीरियर डिजाइनिंग कंपनी संचालित कर रही परिधि यह दर्शाती हैं कि महिलाएं अब उद्यमिता और कॉर्पोरेट नेतृत्व के क्षेत्र में भी आत्मविश्वास के साथ खड़ी हैं। पहाड़ों में आग के लिए बदनाम पिरूल को मंजू शाह द्वारा हस्तशिल्प के माध्यम से आजीविका के अवसर में बदल देना केवल नवाचार नहीं बल्कि पर्यावरणीय चुनौती को आर्थिक संभावना में परिवर्तित करने का उदाहरण है। यह स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग और महिला नेतृत्व की दूरदृष्टि का प्रमाण है।
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बबीता रावत की कहानी रिवर्स पलायन के विमर्श को नई दिशा देती है। एक दशक से अधिक समय तक आर्थिक निर्भरता की स्थिति में रहने के बाद, कोरोना काल में परिस्थितियों को अवसर में बदलते हुए होम-स्टे की शुरुआत करना और आज न केवल आत्मनिर्भर होना, बल्कि लोगों को रोजगार देना यह दर्शाता है कि महिला सशक्तिकरण अब केवल नारों तक सीमित नहीं रहा। इन सभी उदाहरणों में एक समान सूत्र दिखाई देता है। वह है निर्णय लेने की क्षमता, जोखिम उठाने का साहस और सामाजिक स्वीकृति में आई वृद्धि। यह परिवर्तन किसी एक नीति, योजना या वर्ष विशेष का परिणाम नहीं है। यह लंबे समय से चल रहे सामाजिक मंथन, शिक्षा के प्रसार, स्वयं सहायता समूहों के विस्तार और आर्थिक अवसरों के विकेंद्रीकरण का संयुक्त प्रभाव है।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में, जहां पलायन, सीमित संसाधन और भौगोलिक चुनौतियां सदैव चर्चा का विषय रही हैं वहां महिलाओं का यह उभरता नेतृत्व केवल लैंगिक समानता का संकेत नहीं बल्कि विकास की नई दिशा का संकेतक है। यह बताता है कि जब समाज महिलाओं को अवसर और विश्वास देता है तो वे केवल अपने परिवार नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की दिशा बदलने की क्षमता रखती हैं। इन कहानियों को उत्सव के रूप में देखने से ज्यादा जरूरी है इन्हें नीति और सामाजिक विमर्श के केंद्र में रखना, क्योंकि यही उदाहरण भविष्य की विकास यात्रा की वास्तविक आधारशिला हैं।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य उभरकर सामने आता है जिस पर अक्सर पर्याप्त चर्चा नहीं होती। महिला सशक्तिकरण की बात करते समय फोकस सरकारी नौकरी या पारंपरिक उद्यमिता तक सीमित रह जाता है। लेकिन वास्तविक परिवर्तन का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र में दिखाई दे रहा है। बड़ी संख्या में युवतियां कॉरपोरेट, स्टार्टअप, डिजाइनिंग, आईटी, सेवा और क्रिएटिव इंडस्ट्री जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता हासिल कर रही हैं। वे केवल रोजगार प्राप्त नहीं कर रहीं बल्कि उच्च आय अर्जित करते हुए नेतृत्वकारी भूमिकाएं निभा रही हैं। निजी क्षेत्र में लाखों रुपये मासिक आय अर्जित करने वालीं ये युवतियां परिवार और समाज दोनों जगह निर्णयकारी भूमिका में हैं। आर्थिक आत्मनिर्भरता ने उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया है और पारंपरिक भूमिकाओं की सीमाएं स्वतः टूटती दिख रही हैं। यह परिवर्तन केवल आय का नहीं बल्कि मानसिकता का भी है।
सरकारी नौकरी को लंबे समय तक सुरक्षित और प्रतिष्ठित विकल्प माना जाता रहा है। विशेषकर उत्तराखंड जैसे राज्यों में यह एक सामाजिक आकांक्षा रही है। ऐसे में युवतियों का इस पारंपरिक मोह से आगे बढ़कर निजी क्षेत्र की प्रतिस्पर्धी और चुनौतीपूर्ण दुनिया में अपनी पहचान बनाना, मानसिक बदलाव का संकेत है। वे जोखिम लेने को तैयार हैं, कौशल आधारित प्रतिस्पर्धा में विश्वास कर रही हैं और वैश्विक अवसरों को अपनाने में संकोच नहीं कर रहीं। यह प्रवृत्ति दो महत्वपूर्ण संकेत देती है। पहला, शिक्षा और कौशल विकास का प्रभाव अब प्रत्यक्ष दिखने लगा है। दूसरा, परिवारों में बेटियों के करियर को लेकर सोच में बदलाव आया है। जब समाज अवसर देता है और विश्वास करता है तो महिलाएं केवल सहभागी नहीं बल्कि नेतृत्वकर्ता बनकर उभरती हैं।
हालांकि, महिला सशक्तिकरण की राह पूरी तरह समतल नहीं हुई है। दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और किशोरियों के लिए विशेषज्ञ सेवाओं तक पहुंच आसान नहीं है। छोटी-सी बीमारी भी कई किलोमीटर की यात्रा और आर्थिक बोझ का कारण बन जाती है। शिक्षा के क्षेत्र में भी चुनौतियां मौजूद हैं। प्राथमिक स्तर पर सुधार के बावजूद उच्च शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण के अवसर दूर-दराज इलाकों में पर्याप्त नहीं हैं। कई बार परिवारिक जिम्मेदारियों और सुरक्षित परिवहन की कमी के कारण बेटियों की पढ़ाई बीच में रुक जाती है। रोजगार के सीमित अवसर भी एक बड़ी बाधा हैं। स्वरोजगार और स्वयं सहायता समूहों ने रास्ता तो खोला है, लेकिन बड़े पैमाने पर स्थानीय उद्योग और बाजार से सीधे जुड़ाव की कमी अब भी महसूस होती है। डिजिटल और वित्तीय साक्षरता की जरूरत समय की मांग है। सरकारी योजनाओं, ऑनलाइन सेवाओं और बैंकिंग सुविधाओं का पूरा लाभ तभी संभव है जब महिलाएं तकनीक और वित्तीय प्रबंधन में आत्मनिर्भर हों।
उत्तराखंड की ये कहानियां केवल उपलब्धियों का लेखा-जोखा नहीं बल्कि उस अदम्य जिजीविषा का प्रमाण हैं जो पहाड़ की हर महिला के भीतर धड़कती है। अब समय है कि हम उनके संघर्ष को स्वाभाविक न मानें बल्कि उनके अधिकारों को सुनिश्चित करें। महिला दिवस पर यही संकल्प होना चाहिए कि उत्तराखंड की हर बेटी को अवसर मांगना न पड़े, उसके लिए संघर्ष न करना पड़े, उसे उसका हक सहज रूप से मिले, क्योंकि जब पहाड़ की महिलाएं आगे बढ़ती हैं तो पूरा समाज ऊंचाई पाता है।









