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    Home»स्पेशल»बबीता रावत… कोरोना में लौटी पहाड़ और बन गई रिवर्स पलायन की मिसाल
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    बबीता रावत… कोरोना में लौटी पहाड़ और बन गई रिवर्स पलायन की मिसाल

    महानगरों की चकाचौंध और पहाड़ों की शांति के बीच झूलती एक पीढ़ी की दुविधा... बबीता रावत की कहानी उसी द्वंद्व से जन्म लेती है। टिहरी गढ़वाल की इस बेटी ने करीब एक दशक बंगलूरू की तेज रफ्तार जिंदगी में बिताया जहां उनके पति एक टेलीकॉम कंपनी से जुड़े थे। किराये के अपार्टमेंट, बच्चों की पढ़ाई और कॉरपोरेट समय-सारिणी के बीच जीवन व्यवस्थित तो था लेकिन कहीं न कहीं अपूर्ण भी। फिर आया कोरोना काल जिसने रफ्तार थाम दी और सोच को नई दिशा दी। यही पर बबिता का मन विचलित हुआ। मन में सवाल उठा, क्या विकास की राह केवल शहरों से होकर ही गुजरती है? इस सवाल का जवाब उन्होंने वापसी में खोजा। पुश्तैनी घर को होम स्टे में बदलकर उन्होंने न केवल अपना भविष्य संवारा बल्कि पहाड़ में संभावनाओं की नई कहानी भी लिख दी।
    teerandajBy teerandajMarch 9, 2026Updated:March 9, 2026No Comments
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    लोग कहते थे-यहां कौन टूरिस्ट आएगा? पैसा डूब जाएगा। अपने होम स्टे में बैठीं बबिता रावत जब यह वाक्य दोहराती हैं तो आवाज में शिकायत नहीं बल्कि आत्मविश्वास झलकता है। क्योंकि जो कहते थे कौन आएगा? उनको वह जवाब दे चुकी हैं। आज वह चार लोगों को रोजगार दे रही हैं। कमाई इतनी कि जितनी उनके पति कभी बंगलूरू में रहकर किया करते थे उतना वह होम स्टे से कमा ले रही हैं। आज गांव ही उनका कार्यस्थल है। टिहरी में जन्मी बबिता ने नौवीं से बारहवीं तक की पढ़ाई यहीं की। आगे बढ़ने की चाह में ऑफिस मैनेजमेंट का कोर्स किया और स्थानीय स्तर पर नौकरी भी शुरू की। जिंदगी एक सामान्य पहाड़ी युवती की तरह आगे बढ़ रही थी। सीमित संसाधन, लेकिन उम्मीदें बड़ी। साल 2010 में शादी हुई। शादी के बाद कुछ समय तक वह यहीं काम करती रहीं लेकिन 2011 में पति की नौकरी के कारण उन्हें बंगलूरू जाना पड़ा। उनके पति टेलीकॉम कंपनी नोकिया में काम करते थे।

    भागम-भाग
    बंगलूरू की जिंदगी तेज रफ्तार और महंगी थी। किराये के मकान में रहना पड़ता था। करीब 20 हजार रुपये प्रतिमाह। 2011 में बेटे का जन्म हुआ और 2016 में बेटी का। वह दोनों बच्चों की परवरिश में मशगूल हो गईं। बबिता बताती हैं, बाहर अगर आपकी सैलरी लाखों में है तो भी बचत बहुत खास नहीं होती है। क्योंकि मकान का किराया, स्कूल, ट्रांसपोर्ट बहुत महंगा होता है। वह कहती हैं, दस साल बंगलूरू में बीत गए। सब व्यवस्थित चल रहा था। बीच बीच में गांव आते थे।

    कोरोना: सोच बदलने वाला मोड़
    2020 में कोरोना महामारी ने जीवन की दिशा बदल दी। लॉकडाउन और वर्क फ्रॉम होम से उन्हें लगा कि वह घर पर रहकर भी काम कर सकते हैं। इसके बाद बबिता परिवार सहित गांव लौटीं। बबिता बताती हैं, यही उन्हें अहसास हुआ कि जिस गांव को रोजगार के लिए छोड़ा था वही अब अवसर बन सकता है। जब पति का काम घर से चल सकता है तो शहर में महंगे किराये और भीड़भाड़ के बीच क्यों रहा जाए? यहीं से रिवर्स पलायन का निर्णय लिया गया। यह भावनात्मक कदम नहीं था। यह आर्थिक और पारिवारिक संतुलन का फैसला था।

    होम-स्टे: विचार से हकीकत तक
    गांव में पुश्तैनी दोमंजिला मकान था। बबिता ने होम-स्टे योजना के बारे में जानकारी जुटाई। पर्यटन विभाग से प्रक्रिया समझी। परिवार ने ग्राउंड फ्लोर पर रहने का निर्णय लिया और ऊपर के तीन कमरों को होम-स्टे में बदलने की योजना बनाई। शुरुआत में गांव के कई लोगों ने रोका। लोग कहते थे- यहां कौन आएगा? इतना खर्च क्यों कर रही हो? उन्होंने जोखिम सीमित रखा। सात लाख रुपये का लोन लिया। उस समय सब्सिडी 25 प्रतिशत थी। पूरा पैसा लगभग रेनोवेशन में लग गया। बबिता कहती हैं, तब हम लोगों को बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी। इसलिए हमने कम पैसा लोन लिया। हमें यह भी नहीं मालूम था कि इस योजना का लाभ एक बार ही उठाया जा सकता है। हमने सोचा कि अगर नुकसान होता है तो हम उसकी भरपाई कर सकें। उन्होंने उन्होंने सजावट में स्थानीयता को प्राथमिकता दी। पहाड़ी भोजन, साफ-सुथरे कमरे, घरेलू आतिथ्य। सोशल मीडिया पर खुद पेज बनाया, तस्वीरें डालीं और प्रचार संभाला।

    पहला रिस्पॉन्स: उम्मीद से ज्यादा
    उद्घाटन के अगले सप्ताह से ही बुकिंग शुरू हो गई। मेहमानों ने पहाड़ी माहौल और घरेलू वातावरण की सराहना की। धीरे-धीरे होम-स्टे की पहचान बनी। सकारात्मक रिव्यू ने उनका भरोसा बढ़ाया। आज उनके उद्यम से चार स्थानीय लोगों को रोजगार मिला है। किचन, हाउसकीपिंग और गेस्ट मैनेजमेंट की जिम्मेदारी गांव की युवतियों के पास है। इसके अलावा, आसपास की महिलाओं के बनाए अचार, मंडुवा और झंगोरा जैसे उत्पाद भी मेहमानों तक पहुंच रहे हैं। इस तरह एक छोटे से उद्यम ने स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ाव बनाया है।

    परिवार और संतुलन
    बबिता की सफलता में परिवार का साथ महत्वपूर्ण रहा। उनके पति ने नोएडा ट्रांसफर ले लिया और हाइब्रिड मोड में काम करना शुरू किया। कुछ दिन गांव से, कुछ दिन दिल्ली-एनसीआर से। चार साल तक वर्क फ्रॉम होम ने इस बदलाव को स्थिरता दी। बच्चों की पढ़ाई केंद्रीय विद्यालय में जारी है। जो गांव से करीब 10 किलोमीटर दूर है। वह कहती हं, लोग मजबूरी में पलायन करते हैं। अच्छी शिक्षा और मेडिकल सुविधा के लिए। अगर ये सुविधाएं बेहतर हों तो लोग क्यों जाएं? उनका मानना है कि जब जागरूक परिवार सरकारी स्कूलों में बच्चों को भेजेंगे तो गुणवत्ता पर सकारात्मक दबाव बनेगा।

    नमक से पांच से छह हजार रुपये की कमाई

    बबिता बताती हैं कि उनके होम-स्टे में आने वाले पर्यटक अक्सर पहाड़ी खाने के साथ परोसे जाने वाले पारंपरिक नमक के बारे में पूछते थे। भांग, जख्या, लहसुन और स्थानीय मसालों से बना यह नमक मेहमानों को इतना पसंद आता कि वे इसे अपने साथ ले जाने की इच्छा जताते। पर्यटक बार-बार कहते थे यह नमक पैक करके दीजिए। तभी मेरे मन में आया कि क्यों न गांव की किसी महिला को यह काम दिया जाए। बबिता कहती हैं, गांव की एक महिला जो पहले घर तक सीमित थीं और आय का कोई स्थायी साधन नहीं था इस पहल से जुड़ीं। बबिता ने उन्हें सुझाव दिया कि वे पारंपरिक तरीके से नमक तैयार करें और साफ-सुथरी पैकिंग में उपलब्ध कराएं। शुरुआत छोटी थी रसोई में मसाले भूनना, पीसना और हाथ से पैक करना। लेकिन मांग बढ़ती गई। आज स्थिति यह है कि वह महिला अपने घर में बच्चों की देखभाल करते हुए हर महीने चार से पांच हजार रुपये तक कमा लेती हैं। उन्हें कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। बबिता बताती हैं, यह आय भले ही बहुत बड़ी न हो लेकिन गांव के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है। इससे न केवल महिला की आर्थिक भागीदारी बढ़ी है बल्कि आत्मविश्वास भी। अब वह केवल गृहिणी नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म उद्यमी हैं।

    होम-स्टे को और बेहतर कैसे बनाया जाए

    बबिता रावत मानती हैं कि इस क्षेत्र में अभी काफी संभावनाएं हैं। लेकिन गुणवत्ता सुधार जरूरी है। उनके अनुसार सबसे पहले साफ-सफाई और बेसिक सुविधाओं पर विशेष ध्यान होना चाहिए। पर्यटक पहाड़ में सादगी चाहते हैं लेकिन स्वच्छता और आराम से समझौता नहीं। वह कहती हैं, हर होम-स्टे को स्थानीय भोजन को अपनी पहचान बनाना चाहिए। मंडुवा, झंगोरा, भांग का नमक जैसे पारंपरिक व्यंजन पर्यटकों को अलग अनुभव देते हैं। साथ ही डिजिटल उपस्थिति मजबूत हो। गूगल लिस्टिंग, सोशल मीडिया पेज और ऑनलाइन बुकिंग प्लेटफॉर्म से जुड़ना जरूरी है। वह यह भी मानती हैं कि सरकार को प्रशिक्षण कार्यशालाएं बढ़ानी चाहिए ताकि होस्ट को गेस्ट मैनेजमेंट, हाइजीन और ऑनलाइन मार्केटिंग की जानकारी मिल सके। अगर हम प्रोफेशनल अप्रोच अपनाएं तो पहाड़ का होम-स्टे देश-विदेश में अलग पहचान बना सकता है।

    1500 से लेकर 8000 किराया

    टिहरी गढ़वाल की बबिता रावत का होम-स्टे अब एक व्यवस्थित और बहु-विकल्पीय ठहराव केंद्र बन चुका है। वर्तमान में उनके पास छह वुडन कॉटेज हैं जो पहाड़ी शैली और आधुनिक सुविधाओं का संतुलित मेल पेश करते हैं। देवदार की खुशबू और प्राकृतिक दृश्य इन कॉटेज को पर्यटकों के लिए खास अनुभव बनाते हैं। इनका किराया सुविधाओं और सीजन के अनुसार 1500 रुपये से लेकर 8000 रुपये प्रतिदिन तक है। इसके अलावा उन्होंने अपने पुश्तैनी घर में भी दो कमरे पर्यटकों के लिए तैयार किए हैं। यहां अपेक्षाकृत कम बजट वाले यात्री ठहरते हैं। जिन्हें स्थानीय माहौल और पारिवारिक आतिथ्य का अनुभव मिलता है। बबिता का मानना है कि अलग-अलग बजट वर्ग के लिए विकल्प होना जरूरी है ताकि हर वर्ग का पर्यटक पहाड़ की सुंदरता और संस्कृति का आनंद ले सके।

    हम रोजगार के लिए बंगलूरू गए थे लेकिन कोरोना ने सिखाया कि सुकून और संभावना दोनों अपने गांव में भी मिल सकते हैं। जब काम घर से हो सकता है तो फिर शहर में किराये और भागदौड़ के बीच क्यों रहें? लोगों ने कहा- यहां कौन टूरिस्ट आएगा, पैसा डूब जाएगा। लेकिन मुझे भरोसा था कि आज का पर्यटक शांति, साफ हवा और स्थानीय अनुभव चाहता है। हमने बड़ा जोखिम नहीं लिया, सीमित लोन से शुरुआत की और अपने घर के तीन कमरों से होम-स्टे शुरू किया। आज चार लोगों को रोजगार दे पा रही हूं यही सबसे बड़ी संतुष्टि है। रिवर्स पलायन सिर्फ गांव लौटना नहीं है यह अपनी सोच बदलना है। अगर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मजबूत हों, तो पहाड़ छोड़ने की मजबूरी ही खत्म हो सकती है।

    बबीता रावत

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