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    परिधि भंडारी … रचनात्मकता से बनाई पहचान

    किसी के लिए कमरा महज चार दीवारें हो सकता है लेकिन परिधि भंडारी के लिए वह एक खाली कैनवास है। दिल्ली की गलियों से लेकर उत्तराखंड की पहाड़ियों तक परिधि अपने इंटीरियर डिजाइन के जरिए आधुनिकता और परंपरा का एक अनोखा कोलाज पेश कर रही हैं। एक ऐसे क्षेत्र में जहां साइट पर घंटों खड़े रहकर काम करवाना पड़ता है। परिधि ने अपनी मेहनत से यह साबित कर दिया है कि अगर इरादे मजबूत हों तो चुनौतियां भी रास्ता नहीं रोक सकतीं। परिधि का जन्म और प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुई। जहां अमूमन बेटियां टीचिंग या बैंकिंग जैसे सुरक्षित करियर की ओर रुख करती हैं परिधि की आंखों में कुछ और ही था। बचपन में पहाड़ों की पारंपरिक लिखाई (लकड़ी पर नक्काशी) और पत्थरों के बने पुराने घरों की मजबूती ने उन्हें हमेशा आकर्षित किया। अपनी रचनात्मकता को पेशेवर धार देने के लिए उन्होंने डिजाइनिंग की पढ़ाई की और फिर शुरू हुआ एक उद्यमी बनने का सफर...
    teerandajBy teerandajMarch 9, 2026No Comments
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    उत्तर भारत में जहां आज भी बड़ी संख्या में युवा सरकारी नौकरी को ही सुरक्षित और प्रतिष्ठित करियर मानते हैं वहीं देहरादून की युवा उद्यमी 32 वर्षीय परिधि भंडारी ने पारंपरिक सोच से अलग राह चुनी। उन्होंने कॉरपोरेट दुनिया की प्रतिष्ठित कंपनी मैकिंजी एंड कंपनी में काम करने के बाद इंटीरियर डिजाइनिंग जैसे रचनात्मक और चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में कदम रखा। आज वह होटल और कमर्शियल प्रोजेक्ट्स में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं और एक सफल कंपनी मोल्यार बाय पेरी का संचालन कर रही हैं। करीब 15 लोग स्थायी तौर पर उनकी कंपनी में काम कर रहे हैं। इसके अलावा कई लोगों को अस्थायी तौर पर रोजगार दे रही हैं। नौकरी के दौरान लंबे प्रोजेक्ट्स, कड़े डेडलाइन और कई बार 18-20 घंटे तक काम करने के अनुभव ने उन्हें मेहनत की असली परिभाषा सिखाई। परिधि कहती हैं कि उस दौर ने उन्हें यह भरोसा दिया कि वह कठिन परिश्रम से पीछे हटने वाली नहीं हैं लेकिन साथ ही यह एहसास भी हुआ कि जीवनभर वही काम करना चाहिए जिसमें रचनात्मक संतुष्टि मिले। इंटीरियर डिजाइनिंग में उनकी रुचि पहले से थी। किसी भी जगह पर जाते ही वह उसके स्पेस, लाइट और लेआउट के बारे में सोचने लगती थीं।

    शोध के साथ समझी उत्तराखंड की जड़ें
    अपने जुनून को दिशा देते हुए परिधि ने गुरुग्राम स्थित सुशांत स्कूल ऑफ आर्ट एंड आर्किटेक्चर से मास्टर्स किया। मास्टर्स के दौरान उन्होंने उत्तराखंड की पारंपरिक वास्तुकला और कला पर विस्तृत शोध किया। कोटी-बनाल शैली, लाखामंडल क्षेत्र की संरचनाएं और केदारनाथ-बद्रीनाथ जैसे मंदिरों की स्थापत्य परंपरा का अध्ययन उन्होंने क्षेत्र में जाकर किया। उनके अनुसार, किसी भी स्थान के लिए डिजाइन तैयार करने से पहले वहां की संस्कृति और इतिहास को समझना बेहद जरूरी है।

    कॉलेज के दौरान ही उन्होंने काम की शुरुआत कर दी थी। मसूरी के प्रसिद्ध होटल ब्रेंटवुड में उनकी इंटर्नशिप रही जिसने उन्हें होटल डिजाइनिंग की ओर आकर्षित किया। इसके बाद गोवा सहित अन्य पर्यटन स्थलों पर भी उन्होंने प्रोजेक्ट्स पर काम किया। आज उनकी कंपनी मुख्य रूप से होटल और कमर्शियल स्पेस डिजाइन करती है। पांच वर्ष पहले उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर कंपनी की स्थापना की। शुरुआत दिल्ली से हुई लेकिन पर्यटन संभावनाओं को देखते हुए दो वर्ष पहले उन्होंने देहरादून को अपना बेस बना लिया। देहरादून के दांडा धर्मपुर में जन्मी परिधि भंडारी की पढ़ाई दिल्ली में हुई। उनके पिता ओएनजीसी से रिटायर्ड हुए हैं। उनकी माता दिल्ली में गणित और विज्ञान की शिक्षिका हैं।

    सस्टेनेबल और लोकल डिजाइन पर जोर
    परिधि का मानना है कि पहाड़ी राज्यों में डिजाइन करते समय स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है। देहरादून और आसपास के क्षेत्रों में अधिक वर्षा होती है इसलिए मटेरियल का चयन सोच-समझकर करना पड़ता है। वह स्थानीय पत्थर, लकड़ी और मिट्टी के लेप जैसी तकनीकों को प्राथमिकता देती हैं। रासायनिक तत्वों से भरे मटेरियल से बचते हुए सस्टेनेबल दृष्टिकोण अपनाना उनकी कार्यशैली का हिस्सा है। इससे लागत भी नियंत्रित रहती है और स्थानीय कारीगरों को रोजगार भी मिलता है। हाल ही में राजपुर रोड स्थित एक होटल प्रोजेक्ट में उन्होंने देहरादून के पुराने पलटन बाजार की झलक दिखाने वाले कस्टम आर्टवर्क तैयार कराए ताकि पर्यटकों को स्थानीय संस्कृति का अनुभव हो सके।

    इंटीरियर डिजाइनिंग केवल सजावट नहीं
    परिधि इस भ्रम को तोड़ती हैं कि इंटीरियर डिजाइनिंग केवल सजावट तक सीमित है। उनके अनुसार, असली काम प्लानिंग और समन्वय का होता है। एक होटल में एसी सिस्टम, इलेक्ट्रिकल प्लानिंग, लाइटिंग कंट्रोल, किचन लेआउट, फायर सेफ्टी और स्ट्रक्चर सब कुछ विस्तार से डिजाइन करना पड़ता है। रिसेप्शन से एक बटन दबाकर कमरे की लाइट नियंत्रित करना भी इसी योजना का हिस्सा है। सजावट कुल काम का लगभग 10 प्रतिशत है, जबकि 90 प्रतिशत मेहनत तकनीकी और कार्यात्मक योजना में लगती है।

    शिक्षा में व्यावहारिक बदलाव की जरूरत
    परिधि मानती हैं कि आज के युवाओं में प्रतिभा की कमी नहीं है लेकिन व्यावहारिक ज्ञान का अभाव दिखाई देता है। उनका सुझाव है कि कॉलेजों में ऐसे शिक्षक हों जो इंडस्ट्री से जुड़े हों और छात्रों को ग्राउंड लेवल का अनुभव दिलाएं। सिर्फ किताबों की पढ़ाई नहीं, बल्कि साइट विजिट, इंटर्नशिप और लेटेस्ट तकनीकों की जानकारी जरूरी है। निजी क्षेत्र में 80-90 प्रतिशत युवाओं को काम करना है इसलिए शिक्षा को भी उसी अनुरूप तैयार करना होगा।

    महिला-पुरुष की बजाय कार्यक्षमता जरूरी
    इंटीरियर डिजाइनिंग की पढ़ाई में लड़कियों की संख्या अच्छी होती है लेकिन पेशेवर जीवन में कई महिलाएं आगे नहीं बढ़ पातीं। परिधि बताती हैं कि साइट पर वह अक्सर अकेली महिला होती हैं, क्योंकि लेबर और ठेकेदार अधिकतर पुरुष होते हैं। फिर भी उत्तराखंड में उन्हें कभी असहज महसूस नहीं हुआ। उनका कहना है कि यहां लोग महिला या पुरुष के बजाय ज्ञान और कार्यक्षमता को महत्व देते हैं।

    वर्क-लाइफ बैलेंस और आत्मनिर्भरता
    वर्क-लाइफ बैलेंस पर परिधि का मत है कि कोई भी काम अकेले संभव नहीं। जैसे एक प्रोजेक्ट टीमवर्क से पूरा होता है वैसे ही व्यक्तिगत जीवन भी सहयोग से चलता है। वह कहती हैं कि यदि महिलाएं उच्च शिक्षा लेकर केवल घर तक सीमित रह जाएं, तो यह देश की प्रतिभा का नुकसान है। जरूरत है कि महिलाएं आगे बढ़ें, नेतृत्व संभालें और साथ ही दूसरों को भी रोजगार दें।

    ताकि, बनी रहे पहाड़ की खुशबू

    परिधि कहती हैं, अगर दिल्ली, मुंबई और देहरादून के होटल एक जैसे लगने लगे तो पहाड़ पर आने का मतलब ही क्या रह जाएगा। हमारी कोशिश रहती है कि जगह के हिसाब से डिजाइन्स हो। इसलिए हम आधुनिक डिजाइन्स में पहाड़ की संस्कृति को पिरोना नहीं भूलते। परिधि का स्टूडियो मुख्य रूप से होटल, रिसॉर्ट, रेस्तरां और कमर्शियल स्पेस की डिजाइनिंग करता है। वह मानती हैं कि इंटीरियर केवल सजावट नहीं बल्कि एक अनुभव गढ़ने की प्रक्रिया है। डिजाइन की उनकी कार्यप्रणाली चरणबद्ध और शोध आधारित होती है। सबसे पहले क्लाइंट से विस्तृत चर्चा कर उस स्थान की जरूरत, बजट और ब्रांड पहचान को समझा जाता है। इसके बाद स्पेस प्लानिंग की जाती है, जिसमें कमरों का लेआउट, रोशनी की दिशा, वेंटिलेशन और उपयोगिता पर ध्यान दिया जाता है।

    परिधि विशेष रूप से स्थानीय संस्कृति और भौगोलिक परिस्थितियों को डिजाइन में शामिल करती हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में नमी, वर्षा और तापमान को ध्यान में रखकर मटेरियल का चयन किया जाता है। स्थानीय पत्थर, लकड़ी और हस्तशिल्प को आधुनिक डिजाइन के साथ जोड़कर वह ऐसा वातावरण तैयार करती हैं, जिससे पर्यटकों को स्थान की वास्तविक पहचान का अनुभव हो। डिटेल्ड ड्रॉइंग, इलेक्ट्रिकल प्लानिंग, लाइटिंग डिजाइन और साइट सुपरविजन उनकी टीम की जिम्मेदारी होती है। परिधि का मानना है कि सफल होटल डिजाइन वही है, जहां सौंदर्य और कार्यक्षमता का संतुलन बना रहे। आज उनकी कंपनी मोल्यार बाय पेरी देहरादून से संचालित होकर विभिन्न शहरों में प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है और स्थानीय स्तर पर रोजगार भी सृजित कर रही है।

    छोटे घरों में भी इंटीरियर डिजाइन की बड़ी भूमिका

    इंटीरियर डिजाइन को लेकर आम धारणा है कि यह केवल बड़े घरों, होटलों या महंगे प्रोजेक्ट्स के लिए ही जरूरी होता है। लेकिन देहरादून की डिजाइनर परिधि भंडारी का मानना है कि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। उनके अनुसार, छोटे घरों में इंटीरियर डिजाइन की जरूरत और भी अधिक होती है। परिधि कहती हैं कि सीमित जगह में सही स्पेस प्लानिंग सबसे बड़ी चुनौती होती है। यदि डिजाइनर समझदारी से लेआउट तैयार करे तो वही छोटा घर ज्यादा खुला, व्यवस्थित और सुविधाजनक लग सकता है। मल्टी-फंक्शनल फर्नीचर, सही स्टोरेज प्लानिंग, दीवारों और रोशनी का संतुलित उपयोग ये सब छोटे घर को बेहतर बना सकते हैं। वह बताती हैं कि कई लोग सोचते हैं कि इंटीरियर डिजाइन मतलब केवल सजावट या महंगा खर्च। जबकि असल में यह जगह के बेहतर उपयोग की कला है। सही डिजाइन से अव्यवस्था कम होती है, घर में प्राकृतिक रोशनी का बेहतर उपयोग होता है और रहने वालों की दिनचर्या आसान हो जाती है। करियर की दृष्टि से भी यह क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है। आज हर वर्ग के लिए अलग बजट और जरूरत के अनुसार डिजाइन सेवाएं उपलब्ध हैं। ऐसे में इंटीरियर डिजाइन युवाओं के लिए एक रचनात्मक और संभावनाओं से भरा विकल्प बनकर उभर रहा है।

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