शीतलाखेत मॉडल की सबसे बड़ी खासियत इसकी सादगी है, यह आग बुझाने का नहीं, आग लगने की प्रक्रिया को ही रोकने का तरीका है। वर्षों तक चर्चा में रहने, सरकार से लेकर हाईकोर्ट तक इस मॉडल को सराहना मिलने के बावजूद यह मॉडल अभी तक व्यापक स्तर पर लागू नहीं हो पाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खुद इस मॉडल को प्रदेश स्तर पर लागू करने की बात कह चुके हैं। सवाल सीधा है, जब समाधान सामने है, तो उसे अपनाने में देरी क्यों?

उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि केवल सरकारी तंत्र के भरोसे जंगलों की आग पर काबू पाना संभव नहीं है। जंगल—रिजर्व फॉरेस्ट, वन पंचायत और सिविल वन करीब 38 लाख हेक्टेयर में फैले हैं, जहां उनकी सुरक्षा का कोई ठोस ढांचा बनाना भी चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में आग लगने के बाद उसे नियंत्रित करना कई बार लगभग असंभव हो जाता है। शीतलाखेत मॉडल ने इस परंपरा को खत्म नहीं किया बल्कि उसे अनुशासन में ढालकर समस्या का व्यावहारिक समाधान निकाला। उन्होंने परंपरा के समय और तरीके को बदल दिया। ग्रामीणों से कहा गया कि झाड़ियों की कटाई तो करें, लेकिन उन्हें अप्रैल के बाद न जलाएं। इसके बजाय सर्दियों में ही झाड़ियां काटकर सुखा लें और 31 मार्च से पहले नियंत्रित तरीके से जला दें। 1 अप्रैल को ‘ओण दिवस’ मनाना सामूहिक अनुशासन का प्रतीक है।

कैसे शुरू हुई बदलाव की कहानी
इस पहल की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह किसी बाहरी निर्देश का परिणाम नहीं, बल्कि स्थानीय समुदाय की समझ और भागीदारी से विकसित हुई है। 2003 की गर्मियों में अल्मोड़ा के कई जलस्रोत सूखने लगे थे। यह सिर्फ पानी का संकट नहीं था, बल्कि उस पारिस्थितिकी तंत्र के टूटने का संकेत था, जो जंगलों पर टिका था। इसी संकट ने ‘जंगल बचाओ–जीवन बचाओ’ अभियान की नींव रखी। महिलाओं, युवाओं और वन विभाग की साझेदारी से शुरू हुई इस पहल ने आने वाले वर्षों में करीब 1000 हेक्टेयर क्षतिग्रस्त वन क्षेत्र को फिर से जीवित कर दिया। इसमें एसिसटेड नेचुरल रिजनरेशन तकनीक की मदद ली गई और मिश्रित जंगल तैयार किया गया। शीतलाखेत मॉडल की शुरुआत इसी अभियान से हुई थी। स्याही देवी विकास मंच, शीतलाखेत के संयोजक गजेंद्र पाठक बताते हैं कि यहीं से ये समझ बनी कि जंगल की आग सिर्फ पेड़ों को नहीं जलाती, बल्कि जलस्रोतों और नदियों को भी प्रभावित करती है। इसलिए आग बुझाना नहीं समाधान नहीं, आग को रोकना समाधान है।
धीरे-धीरे इस सोच के साथ स्थानीय समुदाय को जोड़ा गया और शीतलाखेत के आसपास करीब 40 गांवों में इस मॉडल को लागू किया गया। लोगों को समझाया गया कि यदि वे सामूहिक रूप से समयबद्ध तरीके से ‘ओण’ जलाएं, तो आग के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह पहल एक सामुदायिक अनुशासन में बदल गई। जिन क्षेत्रों में इस मॉडल को अपनाया गया, वहां जंगलों में आग की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई।
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जंगल बचाने के लिए बदला गया हल
शीतलाखेत मॉडल सिर्फ आग तक सीमित नहीं रहा। जंगलों पर दबाव कम करने के लिए पारंपरिक लकड़ी के कृषि उपकरणों के विकल्प विकसित किए गए। विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा के सहयोग से ‘वीएल स्याही हल’ और ग्रामोद्योग विकास संस्थान, ढैंली और ग्रीन सोल्यूशन, हल्द्वानी के सहयोग से ‘स्याही दनेला’ जैसे नवाचार सामने आए। इन्हें अपनाकर हजारों किसानों ने लकड़ी के हल छोड़ दिए। उत्तराखंड राज्य के 9 पर्वतीय जिलों में लगभग 10,000 से अधिक किसानों द्वारा लकड़ी का हल छोड़कर वीएल स्याही हल से जुताई का काम किया जा रहा है। इससे बांज जैसे महत्वपूर्ण पेड़ों की कटाई में भारी कमी आई।
क्यों खास है शीतलाखेत मॉडल?
- आग लगने से पहले रोकथाम।
- समुदाय आधारित अनुशासन।
- परंपरा का वैज्ञानिक उपयोग।
- कम लागत, स्थानीय समाधान।










