उत्तरकथा से शुरू करते हैं। तभी पूरी कहानी को समझना भी आसान होगा और उसकी राजनीति का असली अर्थ भी साफ दिखाई देगा।
उस समय उत्तराखंड की राजनीति भीतर ही भीतर उबल रही थी। सरकार भाजपा की थी लेकिन सत्ता और संगठन के बीच भरोसे की दरार लगातार चौड़ी होती जा रही थी। कई मुख्यमंत्री बदले जा चुके थे। विधायकों में बेचैनी थी और दिल्ली तक लगातार यह फीडबैक पहुंच रहा था कि अगर जल्द कोई ठोस राजनीतिक फैसला नहीं लिया गया तो राज्य में पार्टी की पकड़ कमजोर पड़ सकती है। ऊपर से विधानसभा चुनाव सिर पर थे। ऐसे माहौल में भाजपा को किसी बड़े जनाधार वाले नेता से ज्यादा एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो बिना शोर किए सत्ता को स्थिर कर सके, संगठन को संतुलित रख सके और दिल्ली के राजनीतिक संकेतों को समझते हुए काम कर सके। यहीं से पुष्कर सिंह धामी की कहानी शुरू होती है।
दिल्ली में बैठा नेतृत्व उस समय उत्तराखंड को सिर्फ एक पहाड़ी राज्य की तरह नहीं देख रहा था। भाजपा के लिए यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अहम प्रयोग क्षेत्र था। पार्टी को ऐसा मुख्यमंत्री चाहिए था जो सिर्फ प्रशासन न चलाए बल्कि संगठन और हाईकमान की राजनीतिक लाइन को बिना टकराव जमीन पर उतार सके। उत्तराखंड के दुर्गम इलाकों तक भागदौड़ कर सके। पुराने नेताओं की तरह विवादित बयानबाजी न करे। कई बड़े नाम चर्चा में थे। वरिष्ठ नेता लॉबिंग कर रहे थे। अपने-अपने समर्थकों के जरिए माहौल बनाया जा रहा था। लेकिन भाजपा की केंद्रीय राजनीति अक्सर वहीं फैसला करती है, जहां बाकी लोग देखने की आदत नहीं रखते।
धामी का नाम जब सामने आया तो देहरादून से लेकर दिल्ली तक कई लोग चौंक गए थे। वजह साफ थी। न वे सबसे वरिष्ठ थे न सबसे प्रभावशाली गुट के नेता। लेकिन भाजपा उस समय अनुभव से ज्यादा अनुकूलता देख रही थी। पार्टी को ऐसा चेहरा चाहिए था जो आदेश मिलने का इंतजार न करे बल्कि संकेत समझकर काम करे। धामी उसी राजनीतिक ढांचे में फिट बैठते थे।

वे संगठन से निकले नेता थे। छात्र राजनीति से लेकर युवा मोर्चा तक उन्होंने लंबा समय पार्टी के भीतर काम करते हुए बिताया था। यही कारण था कि दिल्ली को लगता था कि यह चेहरा सत्ता में आने के बाद अलग शक्ति केंद्र बनाने की कोशिश नहीं करेगा। भाजपा अब राज्यों में ऐसे मुख्यमंत्रियों को आगे बढ़ा रही थी जो क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा से ज्यादा केंद्रीय रणनीति के साथ तालमेल बिठा सकें। उत्तराखंड में धामी उस मॉडल के सबसे उपयुक्त उम्मीदवार माने गए।
भाजपा के भीतर उस समय यह धारणा मजबूत थी कि धामी संगठन की भाषा समझते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनी। धामी को मुख्यमंत्री बनाना सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं था बल्कि भाजपा की उस नई राजनीति का हिस्सा था जिसमें युवा चेहरों को आक्रामक वैचारिक एजेंडे के साथ आगे बढ़ाया जा रहा था। मुख्यमंत्री बनने के बाद धामी ने बहुत जल्दी यह समझ लिया कि सिर्फ कुर्सी संभालने से बात नहीं बनेगी। उन्हें अपना अलग राजनीतिक नैरेटिव बनाना होगा। यही वजह रही कि सत्ता संभालते ही उन्होंने उन मुद्दों पर तेजी दिखाई जो भाजपा के कोर वोटर को सीधे प्रभावित करते हैं।
यूनिफॉर्म सिविल कोड, धर्मांतरण कानून, नकल विरोधी कानून, अतिक्रमण विरोधी अभियान और देवभूमि की सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों को धामी सरकार ने सिर्फ प्रशासनिक फैसले की तरह नहीं पेश किया बल्कि उन्हें वैचारिक संदेश में बदला। भाजपा के भीतर यह माना गया कि धामी ने बहुत कम समय में खुद को सिर्फ अंतरिम मुख्यमंत्री की छवि से बाहर निकाल लिया।
दिलचस्प यह भी है कि धामी को उस समय मुख्यमंत्री बनाया गया जब उत्तराखंड भाजपा लगातार नेतृत्व अस्थिरता से जूझ रही थी। राज्य में मुख्यमंत्री बदलना लगभग राजनीतिक परंपरा बन चुका था। ऐसे में पार्टी को एक लो-रिस्क चेहरा चाहिए था। धामी की शांत शैली, संगठन से जुड़ाव और दिल्ली के साथ सहज तालमेल ने उन्हें इस भूमिका के लिए उपयुक्त बना दिया।

सत्ता संघर्ष का हिस्सा न होना
लेकिन इस कहानी का दूसरा पक्ष भी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने धामी को इसलिए भी चुना क्योंकि वे उस दौर में किसी बड़े विवाद या सत्ता संघर्ष का हिस्सा नहीं थे। कई वरिष्ठ नेताओं की अपनी-अपनी राजनीतिक सीमाएं थीं। कोई गुटबाजी से घिरा था, कोई जनता के बीच स्वीकार्यता खो चुका था, तो किसी को लेकर हाईकमान पूरी तरह सहज नहीं था। धामी बाकी नेताओं की तुलना में क्लीन स्लेट की तरह सामने आए।
मुख्यमंत्री बनने के बाद सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश तब गया जब विधानसभा चुनाव में खुद सीट हारने के बावजूद भाजपा ने उन्हें हटाया नहीं। सामान्य परिस्थितियों में किसी मुख्यमंत्री की चुनावी हार राजनीतिक करियर पर भारी पड़ सकती थी लेकिन भाजपा ने उल्टा उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाकर साफ संकेत दिया कि पार्टी सिर्फ चुनावी आंकड़ों से नहीं, लंबी रणनीति से सोच रही है। दिल्ली यह दिखाना चाहती थी कि धामी अब अस्थायी प्रयोग नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति का हिस्सा हैं।
फैसले लेने से न हिचकना…बनी बड़ी ताकत
धामी की सबसे बड़ी खूबी यही मानी गई कि उन्होंने कभी अपनी राजनीति को पार्टी की राजनीति से बड़ा दिखाने की कोशिश नहीं की। अब उत्तराखंड में धामी सिर्फ प्रशासनिक चेहरा नहीं रह गए हैं। भाजपा उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में पेश कर रही है जो युवा भी है, वैचारिक भी और आक्रामक राजनीतिक फैसले लेने से हिचकता भी नहीं। हालांकि चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं। पलायन, बेरोजगारी, पहाड़ों का खाली होना और सीमित आर्थिक अवसर जैसे मुद्दे आज भी उत्तराखंड की राजनीति के केंद्र में हैं। आने वाले वर्षों में धामी की असली परीक्षा इन्हीं सवालों पर होगी। लेकिन फिलहाल भाजपा के भीतर यह धारणा मजबूत है कि उत्तराखंड में उन्हें वही मुख्यमंत्री मिला है जिसकी तलाश लंबे समय से थी ऐसा नेता जो हर बार आदेश का इंतजार नहीं करता, बल्कि सत्ता की राजनीति में संकेत समझकर आगे बढ़ता है।
भाजपा की विचारधारा को आगे बढ़ाया
धामी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद बहुत जल्दी यह समझ लिया था कि उत्तराखंड में सिर्फ प्रशासनिक फैसलों से राजनीतिक पकड़ मजबूत नहीं होगी। यही वजह रही कि उन्होंने भाजपा की कोर आइडियोलॉजी से जुड़े मुद्दों को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया। यूनिफॉर्म सिविल कोड को सबसे बड़े राजनीतिक संदेश की तरह पेश किया गया। लैंड जिहाद और अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई को सीधे देवभूमि की सांस्कृतिक पहचान से जोड़ा गया। यही कारण है कि धामी मॉडल देश के अन्य राज्य भी अपना रहे हैं। यूसीसी का अध्ययन कई राज्यों में हो रहा है।










