उत्तराखंड की पहचान केवल उसके शिखरों, नदियों और पर्यटन स्थलों से नहीं बनती। उसकी असली ताकत उन गांवों में बसती है, जहां खेत हैं, जंगल हैं, लोक संस्कृति है और सबसे बढ़कर वो लोग हैं, जो तमाम कठिनाइयों के बावजूद पहाड़ से जुड़े हुए हैं। लेकिन आज यही गांव कई तरह की चुनौतियों से जूझ रहे हैं। जमीन की तरह सपने बिखरे नज़र आ रहे हैं, लोग गांव छोड़ रहे हैं और गांवों के मुद्दों की आवाज़ मुख्यधारा के शोर में दब सी गई है।
अतुल्य उत्तराखंड के जून अंक में हमने ऐसे दो विषयों को प्रमुखता से रखा है, जो पहली नजर में अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन गहराई से देखें तो दोनों एक ही सवाल से जुड़े हैं, क्या उत्तराखंड अपने गांवों को बचा पाएगा?
चकबंदी की चर्चा वर्षों से होती रही है। पहाड़ में जो जोतें पहले से बिखरी हुईं थीं, परिवारों के अलग होने के साथ छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटती चली गईं। खेती पहले ही जंगली जानवरों, श्रम की कमी और बढ़ती लागत जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में बिखरी हुई जमीन को एक साथ न ला पाने की मजबूरी बचीखुची हिम्मत तोड़ देती है। चकबंदी को इसी समस्या का समाधान माना जाता रहा है। यह केवल राजस्व व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि खेती को फिर से व्यवहारिक और लाभकारी बनाने का प्रयास है।
उत्तराखंड का अनुभव हमें यह भी सिखाता है कि पहाड़ में केवल सरकारी आदेशों से बदलाव नहीं आते। यहां जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं होती, वह परिवार की यादों, रिश्तों और पहचान का हिस्सा भी होती है। इसलिए चकबंदी का सवाल केवल खेतों का नहीं, विश्वास का भी है। लोगों को साथ लिए बिना कोई भी सुधार टिकाऊ नहीं हो सकता।
दूसरी ओर सामुदायिक रेडियो की कहानी है। जब बड़े मीडिया संस्थान महानगरों और राष्ट्रीय मुद्दों में व्यस्त रहते हैं, तब गांवों की छोटी लेकिन महत्वपूर्ण चिंताओं को कौन सुने? दूरस्थ इलाकों में रहने वाली महिलाओं, किसानों, युवाओं और बुजुर्गों की आवाज़ कौन बने? यही काम सामुदायिक रेडियो वर्षों से कर रहे हैं। हेवलवाणी, मंदाकिनी की आवाज़ और कुमाऊं वाणी जैसे प्रयास केवल प्रसारण केंद्र नहीं हैं, बल्कि समाज और व्यवस्था के बीच संवाद की जीवंत कड़ी हैं।
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इन रेडियो स्टेशनों की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे स्थानीय भाषा में, स्थानीय लोगों के बीच और स्थानीय मुद्दों पर बात करते हैं। वे सूचना भी देते हैं और सहभागिता भी बढ़ाते हैं। कई बार किसी गांव की समस्या, किसी बुजुर्ग की पेंशन, किसी किसान की परेशानी या किसी महिला समूह की सफलता की कहानी बड़े मंचों तक नहीं पहुंच पाती, लेकिन सामुदायिक रेडियो उसे समाज के सामने ला देता है।
दिलचस्प बात यह है कि चकबंदी और सामुदायिक रेडियो दोनों का मूल भाव एक ही है, बिखराव को कम करना और जुड़ाव को मजबूत करना। एक जमीन को जोड़ने की कोशिश है, दूसरा लोगों को जोड़ने की। एक संसाधनों के बेहतर उपयोग की बात करता है, दूसरा समाज की भागीदारी को मजबूत बनाता है।
उत्तराखंड के विकास पर जब भी चर्चा होती है, तब अक्सर सड़क, बिजली, भवन और निवेश जैसे विषय सामने आते हैं। ये जरूरी हैं, लेकिन विकास की असली परीक्षा गांवों में होती है। यदि खेत खाली हैं, युवा लगातार पलायन कर रहे हैं, स्थानीय समाज की आवाज़ कमजोर पड़ रही है, तो विकास के आंकड़े भी अधूरे रह जाएंगे।
योजनाएं देहरादून में बन सकती हैं, लेकिन उनकी सफलता का फैसला आखिरकार गांव ही करते हैं। पहाड़ पर थोपी गई व्यवस्थाएं अक्सर कुछ समय बाद थक जाती हैं, जबकि जिन पहलों को लोग अपना मान लेते हैं, वो पीढ़ियों तक असर छोड़ती हैं। इसलिए चकबंदी हो, कृषि सुधार हो या संवाद के मंचों को मजबूत करने की बात, हर प्रयास के केंद्र में गांव और गांव का भरोसा होना चाहिए।
सच बस इतना है कि पहाड़ का भविष्य केवल योजनाओं और घोषणाओं से तय नहीं होगा। वह इस बात से तय होगा कि हम अपनी जमीन से कितना जुड़ाव बनाए रखते हैं और अपनी आवाज़ को कितना जीवित रखते हैं, क्योंकि किसी भी समाज की असली ताकत उसकी मिट्टी और उसकी चेतना, दोनों में बसती है। शायद यही हमारी इन दोनों कहानियों का साझा संदेश भी है।
पहाड़ की सबसे बड़ी त्रासदी ये नहीं कि जमीन बिखरी हुई है। असली चिंता तब है जब समाज भी बिखरने लगे। चकबंदी जमीन को जोड़ सकती है, सामुदायिक रेडियो लोगों को। उत्तराखंड को आज दोनों की जरूरत है।










