13 जून 2024… दोपहर की तपती खामोशी। जंगल शांत था। फायर वाचर कैलाश भट्ट अपनी सुबह की गश्त पूरी कर चुके थे। सब कुछ सामान्य था, हर दिन की तरह। लेकिन दोपहर बाद एक फोन कॉल ने सब बदल दिया। ‘जंगल में आग लग गई है…’ कुछ ही मिनटों में कैलाश और उनके सात साथी बोलेरो में सवार होकर घटनास्थल की ओर निकल पड़े। दूर आसमान में उठता धुआं साफ दिख रहा था और हर गुजरते मिनट के साथ गाढ़ा होता जा रहा था। मौके पर पहुंचने से पहले ही हालात भयावह हो चुके थे। हवा के साथ आग बेकाबू हो रही थी। चार लोगों को शिव मंदिर के पास रोककर बाकी लोग आगे बढ़ गए, लेकिन कुछ ही दूरी के बाद रास्ता बंद हो चुका था।
आगे आग…पीछे आग…हर तरफ आग। कोई रास्ता नहीं था। सब गाड़ी से कूदे और दौड़ पड़े।

धुएं से भरी हवा, जलती जमीन, और लपटों के बीच 100–150 मीटर की वह दौड़, …शायद जिंदगी की ये सबसे लंबी दौड़ थी। ‘कुछ दिख नहीं रहा था, आंखें बंद हो गई थीं… हम बस भाग रहे थे।’ — कैलाश भट्ट, बिनसर आग में घायल हुए फायर वाचर कपड़े जल रहे थे, सांस रुक रही थी, शरीर जवाब दे गया था। फिर अचानक सब धुंधला पड़ गया। जब होश आया—सब कुछ बदल चुका था। आठ में से छह लोग साथी नहीं रहे थे। दो साल पहले की बिनसर की इस घटना का जिक्र इसलिए क्योंकि जमीन पर हालात बहुत बदले नहीं हैं। ये आग सिर्फ एक घटना नहीं थी… यह उस सिस्टम की कहानी है, जो हर साल जंगल की आग से जूझता है और कई बार हार जाता है। उत्तराखंड में जंगलों में लगने वाली आग अब एक दोहराई जाने वाली आपदा बन चुकी है। हर साल फरवरी से जून के बीच जंगलों में आग लगती है, हर बार बेहतर नियंत्रण के दावे होते हैं। लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। आग लगने की घटनाएं न केवल जारी हैं, बल्कि उनकी संख्या और प्रभाव दोनों बढ़ रहे हैं।
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अब यह आग चमोली जिले की विश्व धरोहर ‘फूलों की घाटी’ से सटे जंगलों तक पहुंच गई है, ऐसे दुर्गम इलाकों में, जहां आग पर काबू पाना आसान नहीं होता। सवाल सिर्फ ये नहीं है कि जंगल क्यों जलते हैं, सवाल यह है कि हर साल वही कहानी क्यों दोहराई जाती है? राज्य गठन के बाद से अब तक लगभग 48,000 से 54,800 हेक्टेयर वन क्षेत्र अलग-अलग स्तर की आग से प्रभावित हो चुका है। 2005 से 2015 के बीच 10,473 आग की घटनाएं दर्ज की गई थीं। हाल के वर्षों में यह संख्या और तेजी से बढ़ी है। 2023–24 के सीजन में नवंबर से जून के बीच 11,256 आग की घटनाएं दर्ज की गईं। सिर्फ फरवरी से अप्रैल 2024 के बीच 7,000 से अधिक घटनाएं सामने आईं और लगभग 1,800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रभावित हुआ। यह स्पष्ट संकेत है कि वनाग्नि अब अपवाद नहीं, बल्कि एक स्थायी पैटर्न बन चुकी है।
इस पैटर्न में सबसे बड़ा बदलाव आग के मौसम या फायर सीजन का लंबा होना है। पहले यह मुख्य रूप से अप्रैल से जून के बीच सीमित रहती थी, लेकिन अब नवंबर से ही घटनाएं सामने आने लगी हैं। जनवरी जैसे महीनों में भी आग लगने की घटनाएं दर्ज की जा रही है। 2026 में शुरुआत में ही वैली ऑफ फ्लावर्स के आसपास लगी आग इस बदलते ट्रेंड का उदाहरण है। विशेषज्ञ इसे जलवायु परिवर्तन और सर्दियों में घटती वर्षा से जोड़ते हैं, जिससे जंगलों में नमी कम हो रही है और आग के लिए अनुकूल परिस्थितियां लंबे समय तक बनी रहती हैं। उत्तराखंड में लगने वाली 90 से 95 प्रतिशत आग मानव जनित मानी जाती है। इनमें जानबूझकर लगाई गई आग और लापरवाही से लगी आग दोनों शामिल हैं। कई इलाकों में नई घास उगाने के लिए जंगल में आग लगाई जाती है, जबकि रेजिन (गोंद) एकत्र करने की प्रक्रिया के दौरान भी आग फैल जाती है। पर्यटकों या स्थानीय लोगों की छोटी-सी लापरवाही भी कई बार बड़े हादसे का कारण बनती है। यह स्पष्ट है कि समस्या केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानवीय हस्तक्षेप से अधिक जुड़ी हुई है। इस संकट को और बढ़ाने में जंगलों की संरचना भी अहम भूमिका निभाती है। राज्य के लगभग 26 प्रतिशत वन क्षेत्र में चीड़ (पाइन) के पेड़ हैं। इनकी सूखी पत्तियां जमीन पर मोटी परत बनाती हैं, जो अत्यधिक ज्वलनशील होती हैं। साथ ही, चीड़ में मौजूद रेजिन आग को तेजी से फैलाता है।

वनाग्नि का असर केवल पेड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मिट्टी और जल स्रोतों पर भी गहरा प्रभाव डालता है। आग के बाद मिट्टी में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे जरूरी पोषक तत्व कम हो जाते हैं, जबकि पीएच और पोटैशियम का स्तर बढ़ जाता है। मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं, जिससे उसकी उर्वरता पर दीर्घकालिक असर पड़ता है। वनस्पति आवरण हटने से मिट्टी का कटाव बढ़ता है और भूमि की गुणवत्ता गिरती है। इसके अलावा, राख और मलबा नदियों और झीलों में पहुंचकर जल को प्रदूषित करते हैं, जिससे जलीय जीवन और प्राकृतिक जल शोधन प्रक्रिया प्रभावित होती है।
शुरुआती लापरवाही बड़ा संकट
फायर सीजन शुरू होने से पहले सिस्टम को पूरी तरह तैयार करना जरूरी है। लेकिन अक्सर व्यवस्था घटना के बाद प्रतिक्रिया देने तक सीमित रहती है। जबकि फायर सीजन की शुरुआत में बरती गई छोटी लापरवाही भी बड़े संकट का रूप ले सकती है। 2016 इसका बड़ा उदाहरण है। जब फरवरी में शुरू हुई आग पर समय रहते नियंत्रण नहीं पाया गया। आग कई हफ्तों तक फैलती रही, बड़े पैमाने पर जंगल इसकी चपेट में आए। यह एक साफ चेतावनी थी कि शुरुआती देरी कितनी भारी पड़ सकती है।

कोरोना काल आई ओपनर?
जंगलों में बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप इस संकट को और बढ़ा रहा है। जिन क्षेत्रों में जंगलों में मानवीय गतिविधियां सीमित हैं, वहां अमूमन आग लगने की घटनाएं कम देखी गई हैं। जंगल में मानवीय हस्तक्षेप के असर को समझना है तो कोरोना काल को देखना चाहिए। 2020 में लॉकडाउन के दौरान मानवीय गतिविधियां कम होने से आग की घटनाओं में भी गिरावट आई। उस वर्ष केवल लगभग 172 हेक्टेयर क्षेत्र ही प्रभावित हुआ। इसके विपरीत, 2023–24 में घटनाओं में फिर तेजी से वृद्धि दर्ज की गई। पौड़ी, नैनीताल, टिहरी और अल्मोड़ा जैसे जिले सबसे अधिक प्रभावित रहे। यह दर्शाता है कि समस्या पूरे राज्य में फैली हुई है।
चुनौतियां अपार, बहुत कुछ करने की दरकार
उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति वाइल्ड फायर से निपटने में सबसे बड़ी चुनौती है। राज्य के अधिकांश वन क्षेत्र दुर्गम इलाकों में हैं, जहां पहुंचना ही चुनौती है। कई जगह सड़क या स्थायी निगरानी ढांचा नहीं है, जिससे सूचना मिलने में देरी होती है। सैटेलाइट अलर्ट उपलब्ध हैं, लेकिन जमीन पर कार्रवाई में अक्सर देरी हो जाती है। इस बीच आग फैल चुकी होती है। फायर वॉचर्स और स्थानीय कर्मचारी शुरुआती प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन उन्हें सीमित संसाधनों और कम मानदेय के साथ काम करना पड़ता है। आधुनिक उपकरणों की कमी भी बहुत बड़ी बाधा है।
आग बुझाने के लिए अक्सर उन्हें पारंपरिक तरीकों- जैसे हरी टहनियों से आग को पीटना या मिट्टी डालने जैसे विकल्पों का सहारा लेना पड़ता है। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब आग बड़े क्षेत्र में फैल जाती है। ऐसे मामलों में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधन अपर्याप्त साबित होते हैं और प्रशासन को हवाई सहायता लेनी पड़ती है। भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टरों के जरिए पानी गिराकर आग बुझाने की कोशिश की जाती है। लेकिन यह विकल्प भी हर स्थिति में प्रभावी नहीं होता। पहाड़ी इलाकों में तेज हवाएं, ऊंचाई और सीमित जल स्रोत इस प्रक्रिया को जटिल बना देते हैं। इसके अलावा, हवाई ऑपरेशन महंगे होते हैं और लंबे समय तक इन्हें जारी रखना व्यावहारिक नहीं होता।
फायर सीजन से पहले की तैयारी में खामियां
राज्य में हर साल आग लगने के बावजूद कई जगहों पर फायरलाइन का रखरखाव समय पर नहीं हो पाता। कई क्षेत्रों में या तो अधूरी तैयारी होती है या फिर उनका रखरखाव नहीं किया जाता है। जब आग लगती है तो उसे रोकने के लिए प्राकृतिक अवरोध उपलब्ध नहीं होते। इसी तरह, ईंधन प्रबंधन यानी जंगल में जमा सूखी पत्तियों, लकड़ियों और मलबे को हटाने का काम भी अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पाता। उत्तराखंड के चीड़ के जंगलों में हर साल बड़ी मात्रा में सूखी पत्तियां गिरती हैं जो आग के लिए अत्यधिक ज्वलनशील सामग्री का काम करती हैं। इन पत्तियों को हटाने या इनके वैकल्पिक उपयोग (जैसे बायो-एनर्जी) के प्रयास किए गए हैं लेकिन ये प्रयास अभी भी सीमित स्तर पर ही हैं। व्यापक स्तर पर ईंधन प्रबंधन की अनुपस्थिति आग के जोखिम को लगातार बढ़ा रही है।
तकनीकी स्तर पर किए प्रयास नाकाफी
ऐसा नहीं है कि राज्य सरकार की तरफ से कुछ नहीं किया गया है। तकनीकी स्तर पर कई प्रयास किए गए हैं। सैटेलाइट आधारित निगरानी, जीआईएस मैपिंग, ड्रोन सर्विलांस और 24×7 कंट्रोल रूम जैसी व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। उत्तराखंड में BHUVAN और अन्य प्लेटफॉर्म के माध्यम से आग की निगरानी की जाती है। मोबाइल ऐप और वेब पोर्टल के जरिये भी आग की जानकारी साझा की जाती है। लेकिन तकनीक की अपनी सीमाएं हैं। यह आग का पता तो लगा सकती है लेकिन उसे बुझा नहीं सकती। जमीन पर कार्रवाई के लिए अब भी मानव संसाधन, उपकरण और स्थानीय समन्वय की आवश्यकता होती है जो कई मामलों में अपर्याप्त साबित होता है।

स्थानीय लोगों के साथ समन्वय की कमी
सिस्टम की एक बड़ी कमजोरी स्थानीय समुदायों के साथ कमजोर समन्वय है। पहाड़ी क्षेत्रों में कभी समुदाय-आधारित वन प्रबंधन की मजबूत परंपरा रही है। स्थानीय लोग जंगलों की निगरानी करते थे और नियंत्रित तरीके से आग लगाकर ईंधन भार को कम करते थे। समय के साथ यह व्यवस्था कमजोर हुई और इसकी जगह एक केंद्रीकृत, प्रशासनिक मॉडल ने ले ली है। इसका नतीजा यह हुआ है कि स्थानीय समुदायों की भूमिका सीमित हो गई, जबकि वही लोग इस समस्या से सबसे पहले और सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। आज कुछ क्षेत्रों में वन पंचायतों और स्वयंसेवी समूहों की भागीदारी दिखाई देती है लेकिन इसे व्यापक और संगठित रणनीति का हिस्सा नहीं बनाया जा सका है।
आग के बाद का प्रबंधन
आग बुझते ही मामला खत्म नहीं होता। असल चुनौती उसके बाद शुरू होती है—जंगल को दोबारा खड़ा करना, मिट्टी को बचाना और नई वनस्पति उगाना। इन कामों पर ध्यान न देने से नुकसान लंबे समय तक बना रहता है। कागजों पर वन पंचायतों और संयुक्त वन प्रबंधन समितियों की भूमिका तय है, लेकिन जमीनी स्तर पर उन्हें पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षण और प्रोत्साहन नहीं मिल पाता। इसका नतीजा यह होता है कि स्थानीय भागीदारी सीमित रह जाती है, और पुनर्स्थापन की प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है।
कभी-कभी जरूरी भी होती है आग!
कभी-कभी जंगल की आग जरूरी भी होती है। कहा जाता है कि प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र में आग की एक भूमिका होती है। यह मृत जैविक पदार्थों को हटाती है। पोषक तत्वों को मिट्टी में वापस मिलाती है। नई वनस्पति के विकास को बढ़ावा देती है। कुछ पौधों की प्रजातियां तो ऐसी होती हैं जिन्हें अपने बीज छोड़ने के लिए आग की आवश्यकता होती है। लेकिन यह प्रक्रिया तभी तक लाभकारी रहती है जब आग कम तीव्रता की हो और लंबे अंतराल पर लगे। उत्तराखंड में समस्या यह है कि आग बार-बार, अनियंत्रित और अधिक तीव्रता के साथ लग रही है। जिससे इसके लाभ लगभग समाप्त हो गए हैं और नुकसान कई गुना बढ़ गया है। इन आगों का प्रभाव बहुस्तरीय है और सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं है। सबसे पहले इसका असर जैव विविधता पर पड़ता है। आग के कारण पौधों, जानवरों और सूक्ष्मजीवों का व्यापक नुकसान होता है। विशेष रूप से छोटे स्तनधारी जीव, पक्षियों के घोंसले और परागण करने वाले कीट सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। इसके अलावा, जंगल में रहने वाले जीवों के आवास नष्ट हो जाते हैं, जिससे उनकी मृत्यु दर बढ़ जाती है या वे पलायन करने को मजबूर हो जाते हैं।
क्या है समाधान
समाधान केवल तकनीक में नहीं, बल्कि समन्वय में है। स्थानीय समुदायों की भागीदारी, बेहतर फ्यूल मैनेजमेंट, फायर लाइन का रखरखाव और आधुनिक तकनीक का प्रभावी उपयोग—ये सभी जरूरी कदम हैं। सहायतित प्राकृतिक पुनरोत्पादन (ANR) जैसे मॉडल दिखाते हैं कि प्रकृति के साथ मिलकर काम करने से बेहतर और टिकाऊ परिणाम मिल सकते हैं।










