कहते हैं, पहाड़ की सबसे बड़ी ताकत उसकी जमीन है। विडंबना यह है कि यही जमीन आज उसकी सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। उत्तराखंड के गांवों में एक परिवार की जोत पांच-दस टुकड़ों में बिखरी हुई है। कहीं खेत गांव के ऊपर हैं, कहीं नीचे और कहीं कई किलोमीटर दूर। पीढ़ियों से हुए बंटवारे ने खेती को इतना बिखेर दिया है कि न उत्पादन का वॉल्यूम बन पाता है और न खेती लाभकारी रह जाती है। यही वजह है कि चकबंदी का सवाल पिछले पांच दशकों से उत्तराखंड की कृषि बहस के केंद्र में बना हुआ है।
दरअसल, सरकार स्वैच्छिक चकबंदी की बात इसलिए कर रही है क्योंकि पहाड़ में जबरन चकबंदी व्यवहारिक रूप से संभव नहीं मानी जाती। मैदानी क्षेत्रों में जहां प्रशासनिक हस्तक्षेप के जरिए भूमि का पुनर्गठन करना आसान है, वहीं पहाड़ में पूरी प्रक्रिया आपसी सहमति पर निर्भर करती है। यहां किसी किसान को यह नहीं कहा जा सकता कि वह अपना खेत छोड़कर दूसरी जगह जमीन स्वीकार कर ले। यदि दो या अधिक भूमिधर स्वेच्छा से जमीनों का संटवारा करने को तैयार हों, तभी चकबंदी आगे बढ़ सकती है। लेकिन उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सबसे बड़ी चुनौती यही है, सहमति बनाना। कई विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ में जमीन से ज्यादा सहमति बिखरी हुई है।
पर्वतीय क्षेत्रों में बिखरी जोतों को एक करने और कृषि को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से पुष्कर सिंह धामी सरकार ने ‘उत्तराखंड राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में स्वैच्छिक/आंशिक चकबंदी प्रोत्साहन नीति-2026’ को मंजूरी दी है। सरकार का मानना है कि यह नीति कृषि उत्पादन बढ़ाने, खेती की लागत कम करने और पर्वतीय क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को गति देने में सहायक होगी।

नीति के क्रियान्वयन के लिए पहली जून को शासनादेश (जीओ) जारी हो चुका है। इससे पहले धामी कैबिनेट ने एक अहम फैसले में राज्य के 11 पर्वतीय जिलों के लिए इस नीति को मंजूरी दी है। इसके तहत अगले पांच वर्षों में 275 गांवों को चकबंदी प्रक्रिया से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। विवाद रहित गांवों को प्राथमिकता दी जाएगी तथा न्यूनतम 10 हेक्टेयर भूमि अथवा 25 अलग-अलग खाताधारकों की लिखित सहमति होने पर चकबंदी की प्रक्रिया शुरू की जा सकेगी।
सरकार ने चकबंदी व्यवस्था को सक्रिय करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए उत्तराखंड राज्य के गठन के समय से ही यहां चकबंदी विभाग में कार्यरत उत्तर प्रदेश कैडर के 121 कार्मिकों को अब उत्तराखंड चकबंदी विभाग में ही समायोजित कर दिया। हालांकि, असली चुनौती अब भी वही है जो दशकों से बनी हुई है, क्या गांवों में आपसी सहमति बन पाएगी और क्या यह पहल वास्तव में जमीन पर उतर सकेगी?
पर्वतीय क्षेत्रों में चकबंदी की जरूरत कोई नई बात नहीं है। इस मुद्दे को लेकर 70 के दशक में गणेश सिंह ‘गरीब’ ने आंदोलन शुरू किया था। करीब पचास वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन उनका संघर्ष आज भी जारी है। 90 साल की उम्र पार कर चुके गणेश सिंह गरीब ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है, हालांकि उनकी आंखों में लंबे इंतजार की थकान साफ पढ़ी जा सकती है।
धामी सरकार द्वारा स्वैच्छिक चकबंदी की नई पहल को लेकर भी वह बहुत उत्साहित नजर नहीं आते। उनका तर्क है कि राज्य गठन के बाद लगभग हर सरकार ने चकबंदी का वादा किया, घोषणाएं कीं और योजनाएं बनाईं, लेकिन खेतों तक बदलाव नहीं पहुंच पाया। इसलिए अब वह दावों से ज्यादा नतीजों का इंतजार कर रहे हैं। ‘अतुल्य उत्तराखंड’ से बातचीत में उन्होंने धीमी आवाज में सिर्फ इतना कहा, देखिए… इस बार क्या होता है।

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बार-बार बंदोबस्ती की बात क्यों?
उत्तराखंड के कई पर्वतीय क्षेत्रों में दशकों से व्यापक बंदोबस्त नहीं हुआ है। इस दौरान कहीं खेतों पर मकान बन गए, कहीं सड़कें निकल गईं, कहीं नदी-बाढ़ से भूमि का स्वरूप बदल गया, लेकिन राजस्व रिकॉर्ड आज भी पुरानी स्थिति दर्शाते हैं।
दरअसल, बंदोबस्ती यानी सेटलमेंट भूमि का आधिकारिक सर्वेक्षण और अभिलेखों को अपडेट करने की प्रक्रिया है। इसके तहत किसी क्षेत्र की जमीन का माप किया जाता है, खेतों की सीमाएं तय की जाती हैं, स्वामित्व का सत्यापन किया जाता है और राजस्व अभिलेखों को वर्तमान स्थिति के अनुसार अपडेट किया जाता है।
सरल शब्दों में कहें तो बंदोबस्त सरकार द्वारा तैयार किया गया भूमि का आधिकारिक रिकॉर्ड होता है, जिसमें यह दर्ज होता है कि कौन-सी जमीन किसकी है, उसका क्षेत्रफल कितना है, उसका उपयोग क्या है और उस पर राजस्व देयता कितनी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चकबंदी से पहले बंदोबस्त जरूरी है, क्योंकि यदि भूमि अभिलेख ही पुराने या गलत होंगे तो जमीनों का पुनर्गठन नए विवाद पैदा कर सकता है। यही कारण है कि भूमि विशेषज्ञ और पूर्व प्रशासनिक अधिकारी पहले बंदोबस्त और रिकॉर्ड दुरुस्ती, उसके बाद चकबंदी की वकालत करते हैं।
टुकड़ों में संशोधनों की बजाय समग्र भूमि संहिता की जरूरत
चकबंदी भूमि सुधार का अंतिम चरण है, पहला नहीं। यदि बंदोबस्त अधूरा है, भूमि अभिलेख अपडेट नहीं हैं और सीमांकन स्पष्ट नहीं है, तो चकबंदी नए विवाद भी पैदा कर सकती है। उत्तराखंड में समग्र भूमि संहिता (लैंड कोड) बनाने की जरूरत है। वर्तमान व्यवस्था में भूमि से जुड़े प्रावधान कई अलग-अलग कानूनों में बिखरे हुए हैं जिसके कारण नीतिगत भ्रम और प्रशासनिक जटिलताएं लगातार बढ़ रही हैं। भूमि प्रबंधन का आधार अब भी पुराने कानूनों और समय-समय पर किए गए संशोधनों पर टिका हुआ है। जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, राजस्व कानून, भू-हस्तांतरण संबंधी प्रावधान और जनजातीय क्षेत्रों के अलग नियम समानांतर रूप से लागू हैं। इसके चलते भूमि स्वामित्व, हस्तांतरण, बंदोबस्त, चकबंदी और भूमि उपयोग से जुड़े मामलों में अक्सर व्यावहारिक कठिनाइयां सामने आती हैं।
विभिन्न सरकारों ने जरूरत के अनुसार कानूनों में संशोधन तो किए लेकिन भूमि प्रबंधन के लिए एकीकृत दृष्टिकोण विकसित नहीं किया। इस वजह से आज भी भूमि अभिलेखों की स्थिति, बंदोबस्त, सीमांकन, स्वामित्व विवाद और भू-उपयोग परिवर्तन जैसे विषय अलग-अलग व्यवस्थाओं के बीच उलझे हुए हैं।
किसी भी प्रभावी भूमि नीति की नींव सटीक डेटा और अपडेट रिकॉर्ड होते हैं। लेकिन राज्य के अनेक क्षेत्रों में बंदोबस्त और भूमि अभिलेखों को अपडेट करने की प्रक्रिया अधूरी है। ऐसे में नई नीतियां बनाने और उन्हें लागू करने में भी कठिनाई आती है। नई भूमि संहिता में भूमि अभिलेख, बंदोबस्त, चकबंदी, भूमि हस्तांतरण, जनजातीय क्षेत्रों की सुरक्षा, कृषि भूमि संरक्षण और भू-उपयोग नियमन जैसे विषयों को एक ही ढांचे में शामिल किया जाना चाहिए। इससे कानूनों के बीच टकराव कम होगा और प्रशासनिक प्रक्रिया अधिक पारदर्शी एवं प्रभावी बन सकेगी। भूमि से जुड़े विवादों और नीतिगत चुनौतियों का स्थायी समाधान केवल आंशिक संशोधनों से नहीं, बल्कि व्यापक भूमि सुधार और समग्र भूमि संहिता के निर्माण से ही संभव है।
अब तक स्वैच्छिक चकबंदी के कुछ प्रयोग हुए हैं लेकिन वे भी पूरी तरह सफल नहीं माने जा सकते। वर्तमान में पर्यटन गतिविधियों और भूमि की बढ़ती कीमतों के कारण ऐसे क्षेत्रों में नए विवाद भी सामने आ रहे हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की भूमि से जुड़े कानूनी प्रावधान भी व्यापक चकबंदी की राह में बड़ी चुनौती हैं। कई मामलों में भूमि हस्तांतरण पर प्रतिबंध हैं जबकि जनजातीय क्षेत्रों में भूमि के स्वामित्व और हस्तांतरण के अलग नियम लागू होते हैं। ऐसे में पूरे गांव की भूमि का पुनर्गठन कानूनी जटिलताओं में फंस सकता है।
पूर्व में चकबंदी के लिए कार्यालय स्थापित किए गए थे और कुछ क्षेत्रों में प्रक्रिया शुरू भी हुई, लेकिन अनेक गांवों में इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सका। कई स्थानों पर अधिसूचनाएं तक निरस्त करनी पड़ीं। मेरा मानना है कि मैदानों में जहां भूमि अपेक्षाकृत समतल और सिंचित है वहां चकबंदी अपेक्षाकृत सफल हो सकती है लेकिन पहाड़ में परिस्थितियां अलग हैं।
इसलिए सरकार को पहले भूमि बंदोबस्त, रिकॉर्ड दुरुस्ती और सर्वेक्षण पर प्राथमिकता से काम करना चाहिए। इसके बाद किसानों को प्रोत्साहित कर स्वैच्छिक चकबंदी की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। उनके अनुसार केवल घोषणा कर देने से चकबंदी सफल नहीं होगी बल्कि इसके लिए कानूनी, प्रशासनिक और व्यवहारिक बाधाओं का समाधान भी जरूरी है।
– जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक

पहाड़ में जमीन नहीं, सहमति बिखरी हुई है
स्वैच्छिक चकबंदी की इन दिनों काफी चर्चा है। इसे पहाड़ की खेती को पुनर्जीवित करने और पलायन रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। तर्क यह है कि यदि किसानों की बिखरी हुई जमीनों को व्यवस्थित कर एक स्थान पर लाया जाए तो खेती आसान होगी, लागत घटेगी और उत्पादन बढ़ेगा। लेकिन मेरे अनुभव में यह विषय जितना सरल दिखाई देता है, वास्तव में उतना है नहीं।
उत्तराखंड में चकबंदी केवल खेतों के पुनर्गठन का मामला नहीं है। यह पहाड़ के भूगोल, सामाजिक संरचना, पारिवारिक रिश्तों और जमीन से जुड़े भावनात्मक संबंधों का भी विषय है। हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी इलाकों और देहरादून के कुछ हिस्सों में चकबंदी अपेक्षाकृत आसान है। वहां खेत बड़े हैं और एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। लेकिन पहाड़ की स्थिति बिल्कुल अलग है। यहां एक ही परिवार की जमीन कई स्थानों पर बिखरी होती है। कोई खेत गांव के ऊपर है, कोई नीचे ढलान पर और कोई दूसरे छोर पर। ऐसे में जमीनों का पुनर्गठन तकनीकी और सामाजिक दोनों स्तरों पर चुनौतीपूर्ण हो जाता है। चकबंदी का मूल उद्देश्य तो यही है कि किसान की सारी जमीन एक जगह हो जाए ताकि सिंचाई, जुताई और खेती आसान हो सके। लेकिन पहाड़ में बिखरी जोतों को मनमाने ढंग से काटा या बदला नहीं जा सकता। यहीं से पूरी समस्या शुरू होती है।
अधूरी प्रक्रिया ही पूरी समस्या
कई गांवों में लोगों ने आपसी सहमति से खेतों का संटवारा तो कर लिया, लेकिन कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं की। नतीजतन, उनका नाम राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में नहीं चढ़ा। गांव में पटवारी या लेखपाल को बता देना काफी नहीं होता। रिकॉर्ड अपडेट करना, नामांतरण और राजस्व अभिलेखों में बदलाव जरूरी होता है। कानून में जमीन एक्सचेंज की व्यवस्था पहले से है। लेकिन लोग आधी प्रक्रिया करके रुक जाते हैं। बाद में यही विवाद की वजह बनती है।
पैसों का सवाल बढ़ा देता है विवाद
चकबंदी में भूमि की गुणवत्ता और मालियत का प्रश्न भी सामने आता है। कई लोग सुझाव देते हैं कि यदि मूल्य का अंतर हो तो उसे धनराशि देकर समायोजित किया जा सकता है। यह सैद्धांतिक रूप से संभव है, लेकिन व्यवहार में यहीं से विवाद बढ़ने लगते हैं। जैसे ही पैसों का लेन-देन जुड़ता है, लोगों की अपेक्षाएं बदल जाती हैं। सहमति बनाना कठिन हो जाता है और स्टांप ड्यूटी जैसे सवाल भी सामने आने लगते हैं। सरकार चाहे तो विशेष परिस्थितियों में राहत दे सकती है, लेकिन इससे सारी समस्या खत्म नहीं होगी।
हरिद्वार के कुछ क्षेत्रों में चकबंदी की प्रक्रिया तीन दशक से अधिक समय से चल रही है। जब यह प्रक्रिया शुरू हुई थी, तब जो बच्चे पैदा हुए थे वे आज स्वयं माता-पिता बन चुके हैं, लेकिन चकबंदी अब भी पूरी नहीं हो सकी। यह उदाहरण बताता है कि चकबंदी केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है। यह एक दीर्घकालिक सामाजिक प्रक्रिया है। जैसे-जैसे समय बढ़ता है, वैसे-वैसे विवाद, मुकदमेबाजी और भ्रष्टाचार की संभावनाएं भी बढ़ती जाती हैं।
मेरे विचार से पहाड़ में चकबंदी की सबसे बड़ी चुनौती खेतों को जोड़ना नहीं, बल्कि लोगों को साथ लाना है। यदि सहमति, विश्वास और पारदर्शिता नहीं होगी तो सबसे अच्छी नीति भी कागजों से आगे नहीं बढ़ पाएगी।बाप-दादा की जमीन है, कैसे छोड़ दूं
पहाड़ में जमीन केवल खेती का साधन नहीं है। वह परिवार की स्मृतियों, पहचान और विरासत का हिस्सा भी होती है। यही वजह है कि चकबंदी की चर्चा आते ही मामला केवल खेतों के पुनर्गठन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भावनाओं से भी जुड़ जाता है। सेवानिवृत्त आईएएस एस.एस. रावत कहते हैं कि आदमी केवल खेत की उपयोगिता नहीं देखता, उसका जमीन से भावनात्मक रिश्ता भी होता है। वह सोचता है कि यह उसके बाप-दादा की जमीन है, इसलिए उसे छोड़ना या बदलना आसान नहीं होता। पहाड़ के अनेक गांवों में बड़ी मात्रा में जमीन खाली पड़ी है। खेती नहीं हो रही, कई परिवार पलायन कर चुके हैं, लेकिन जैसे ही जमीन बेचने या बदलने की बात आती है, लोग पीछे हट जाते हैं। इसकी वजह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी है। वह कहते हैं, ‘खुद से एक सवाल पूछिए। अगर सरकार आपसे कहे कि अपनी जमीन छोड़ दीजिए और दूसरी जगह सारी सुविधाओं के साथ बस जाइए, तो क्या आप तुरंत तैयार हो जाएंगे? शायद नहीं। जमीन से जुड़ा फैसला लोगों के लिए सबसे कठिन फैसलों में से एक होता है। यदि सरकार जबरन चकबंदी लागू करने की कोशिश करती है तो सामाजिक तनाव और वैमनस्य की स्थिति भी पैदा हो सकती है। यही कारण है कि पहाड़ में चकबंदी का आधार कानून से ज्यादा सहमति को माना जा रहा है।
मालियत… सबसे बड़ी बाधा
चकबंदी की राह में एक और बड़ी चुनौती है, मालियत, यानी जमीन की गुणवत्ता और मूल्य। पहाड़ में हर खेत की उपयोगिता अलग होती है। कोई खेत अधिक उपजाऊ है, किसी तक सिंचाई का पानी पहुंचता है, कोई सड़क के पास है तो कोई दुर्गम ढलान पर स्थित है। ऐसे में जमीनों का संटवारा केवल क्षेत्रफल के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।
रावत उदाहरण देते हैं कि यदि एक जमीन की मालियत 60 पैसे और दूसरी की 50 पैसे है, तो दोनों को बराबर मानना आसान नहीं होगा। मैदानी क्षेत्रों में ऐसे अंतर का समायोजन अपेक्षाकृत सरल हो सकता है, लेकिन पहाड़ में खेत पहले ही बहुत छोटे हैं। उन्हें और छोटे हिस्सों में बांटना व्यवहारिक नहीं माना जाता। ऐसे में यदि किसी किसान को लगे कि वह बेहतर जमीन छोड़ रहा है और बदले में कम उपयोगी जमीन पा रहा है, तो विवाद की शुरुआत वहीं से हो जाती है।
– एस.एस. रावत, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी

2016 के एक्ट के प्रावधानों के तहत होगी चकबंदी
अगर ज्यादा गांव स्वैच्छिक चकबंदी पर सहमत होते हैं तो चयन कैसे होगा?
स्वैच्छिक चकबंदी के लिए कोई लिमिट नहीं रखी गई है, जितने चाहे उतने गांव स्वैच्छिक चकबंदी के लिए आगे आ सकते हैं। जिलाधिकारियों को अलग-अलग टॉरगेट दिए गए हैं। पूरा पहाड़ भी चाहे तो स्वैच्छिक चकबंदी करा सकता है। राज्य सरकार का जोर इसी बात पर है कि लोग खुद से आगे आएं। इसीलिए इस नीति में कृषि इनपुट जोड़ा गया है। लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए कई सौगातें दी जा रही हैं। राज्य सरकार की कोशिश है कि खेत एक जगह पर आ जाएं और जिन जगहों पर स्वैच्छिक चकबंदी हो वहां रिकॉर्ड दुरुस्त हो जाएं।– एसएन पांडे, राजस्व सचिव
क्या चयनित गांवों में पहले बंदोबस्त होगा?
यह स्वैच्छिक चकबंदी है, इसमें जो लोग आगे आएंगे उन्हीं का रिकॉर्ड अपडेट होगा।
क्या रिकॉर्डों का डिजिटाइजेशन साथ-साथ चलेगा?
जिन गांवों का चयन स्वैच्छिक चकबंदी के लिए होगा वहां शामिल होने वाले लोगों के भूमि अभिलेख भी अपडेट किए जाएंगे। भूमि अभिलेख और नक्शों का डिजिटलीकरण पहले ही हो चुका है। चकबंदी के दौरान होने वाले सभी बदलाव डिजिटल रिकॉर्ड में ही दर्ज किए जाएंगे। तीन साल बाद सफलता मापने का पैमाना क्या होगा? योजना की प्रगति का आकलन किसी तय प्रतिशत या पैमाने के आधार पर नहीं किया जाएगा। इसके लिए गठित समिति समय-समय पर समीक्षा करेगी। सरकार चाहती है कि लोग स्वेच्छा से इस व्यवस्था को अपनाएं इसलिए इसमें कई प्रोत्साहन दिए गए हैं। 2016 के एक्ट का क्या स्टेट्स है? 2016 का अधिनियम प्रभावी है। स्वैच्छिक चकबंदी उसी के प्रावधानों के तहत होगी। पर्वतीय क्षेत्रों में चकबंदी की प्रक्रिया अपेक्षाकृत जटिल है क्योंकि वहां भूमि के छोटे-छोटे और बिखरे हुए टुकड़े होते हैं तथा सभी पक्षों को सुनवाई का अवसर देना पड़ता है। मैदानी क्षेत्रों में बड़े भूखंड होने के कारण प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान रहती है। भूमि के मूल्यांकन (मालियत) के आधार पर किसी व्यक्ति को अधिकतम दो या तीन चक मिल सकते हैं। मालियत का विषय जटिल अवश्य है लेकिन इसके लिए अधिनियम में स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं।
सफल मॉडल बनेंगे तो बढ़ेगा लोगों का भरोसा
पिछले 12 वर्षों के राजस्व प्रशासन के अनुभव के आधार पर मेरा मानना है कि सरकार की इस पहल का लोगों को अधिकतम लाभ उठाना चाहिए। पहाड़ों में खेती की भूमि लगातार छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटती गई है। परिवारों के विभाजन के साथ जोतें भी बिखरती चली गईं, जिससे खेती की उत्पादकता और आर्थिक व्यवहार्यता दोनों प्रभावित हुई है। आज स्थिति यह है कि बिखरी हुई जोतों के कारण किसानों को न तो अपेक्षित उत्पादन मिल रहा है और न ही खेती से पर्याप्त आय हो रही है। ऐसे में स्वैच्छिक चकबंदी कृषि सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। वर्तमान में मेरी तैनाती टिहरी गढ़वाल में है और यहां एक गांव ने स्वैच्छिक चकबंदी के लिए प्रस्ताव भी दिया है। हमारी कोशिश होगी कि नैनबाग क्षेत्र के उस गांव में इस योजना को सफलतापूर्वक लागू किया जाए। मेरा विश्वास है कि यदि एक-दो गांवों में सफल मॉडल विकसित होते हैं तो लोगों का भरोसा बढ़ेगा और दूसरे गांव भी इस दिशा में आगे आएंगे।
– शैलेंद्र सिंह नेगी, अपर जिलाधिकारी, टिहरी गढ़वाल











